ताज महल: हंगाम क्यों है बरपा

  By : Rahul Tripathi | November 2, 2017 8:18 pm

आज कल ऐतिहासिक धरोहरों को लेकर नयी तरह की बहस छ़ड़ी हुई है।जैसाकि ताज महल को लेकर देखा जा रहा है। नेताओं का एक पूरा वर्ग इस बहस में अन्धमुख सामिल होता जा रहा है और एक से बढ़ कर एक वक्तव्य जारी कर रहे हैं। जैसाकी उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी दल के एक नेता ने कहा कि हम मुगलों के निशां को मिटा कर रहेगें। आगरा के बिधायक नें तो यहां तक कहा कि 17वीं शताब्दी में शिव मंदिर को ध्वस्त करके ताज महल का निर्माण किया गया था

वास्तव में इस सारे विवाद की जड़ उत्तर प्रदेश सरकार की वह सूची है जिसमें प्रदेश की धरोहरों में ताज महल को स्थान नहीं दिया गया है। कुछ़ नेताओं व्दारा इस पूरे घटनाक्रम को सम्प्रदाइक रूप देने का प्रयास किया गया लेकिन इन सभी राजनीतिक बयान बाजियों में ऐतिहासिक तख्यों को नजर अंदाज किया जा रहा है।

ऐतिहासिक दृष्टि से इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ताज महल का निर्माण किसी मंदिर को ध्वस्त करके किया गया था। आगरा के इतिहास का प्रारम्भ् लोदी शासक सिकन्दर से होता है जब 1504 में इस शहर की स्थापना की गयी। 1506 में सिकन्दर लोदी ने आगरा को अपनी राजधानी बनाया। अन्तिम लोदी शासक इब्राहिम लोदी को 1526 ई में पानीपत के तृतीय युद्ध में पराजित करके मुगल बाबर ने आगरा पर अधिकार कर लिया।ताज महल के इतिहास का प्रारम्भ मुगल शासक शाहजहां के शासन काल में 1631 ई से हुआ।

बादशाह ने अपनी प्रिय बेगम अर्जुमन्द बानो बेगम (मुमताज महल) की मृत्यु के बाद उसकी कब्र में, उसकी याद को यादगार बनाने के लिए ताज महल का निर्माण कराया। ताज महल का निर्माण कार्य अहमद लाहौरी के देख रेख में 1653 ई में पूरा किया गया। ईरान के ततकालीन मशहूर स्थापत्यकार ईशा खां ने इस नायाब एतिहासिक धरोहर का डिजाइन तैयार किया था। 20000 हजार मजदूरों के अथक प्रयास के व्दारा इस बेमिशाल ईमारत को साकार किया गया।

ताज महल का निर्माण शाहजहां की इच्छा पर बेदाग सफेद संगमरमर से किया गया है जो राजस्थान के मकराना से लाया गया था। मुगल स्थापत्यकला के अनुसार एक आयताकार बाग में ऊंचे चबूतरे पर इस इमारत की परिकल्पना की गयी है। इसको पच्चीकारी के व्दारा खूबसूरत फूलों  की आकृतियो से सजाया गया है।साथ ही साथ इमारत के आन्तरिक भाग को सजाने के लिए संगमरमर पर गुलाब के आकार की जालियों को काटा गया है।

 

स्थापत्य की इस विशेषता के कारण शायद इसे हिन्दू स्थापत्य समझा जाता है।इमारत पर चार मिनारें बनाई गयी हैं तथा मुख्य हिस्से के ऊपरी भाग में दोहरा गुम्मद बाहर की तरफ उभरा हुआ बनाया गया हैजो प्याज के आकार का है। यह ताज महल की सुन्दरता को और बढ़ाता है साथ ही इमारत पर ईरानी प्रभाव को स्पष्ट करता दिखाई पड़ता है।

संक्षेप में ताज महल भारतीय-ईरानी स्थापत्य का एक बेजोड़ मिश्रण है जो मुगलो के शासनकाल में अपनी कला की चरम पर पहुचीं। यह किसी विदेशी आधिपत्य का द्योतक नहीं हैं बल्रि उस कला का प्रमाण है जो वर्षो पहले जन्मी, विकसित हुयी और कैई पीढ़यों से संचारित होते हुए मुगलों के शासन काल में अपनी चरम पर पहुंची। मुगलों ने इस बेजोड़ कला को संगरक्षण प्रदान करके भारत की इल अनुपम कलाकृति को सम्पूर्ण विश्व के सामने लेकर आए जिससे हम भारतियों को गौरानवित होने का औसर प्राप्त हुआ

अत: ताज महल को एक साम्प्रदाइक दायरे में बांधना सही नही है यह भारतियता का जीवांत प्रमाण है। यह हिन्द मुसलमान दोनों की साझा सांस्कृतिक विराशत का प्रतिबिम्ब है। यह कहना कि ताज महल हमारी गुलामी का प्रमाण है, गलत है। मुगल बेशक बाहर से आएं हों परन्तु उन्होंने भारत का अपनाया, सुरक्षित किया और यहीं दफ्फन हो गए। यदि इनको बाहरी कहेंगे तो माफ कीजिए गा, अधिकांश भारतीय बाहरी हो जाएंगे।

इतिहास गवाह है कैई विदेशी जातियां सदियों से भारत में आती रहीं है और समय के साथ यहां पर बस गयी। आज उनका कोई स्वतंत्र अस्तिव नही मिलता है। सिकन्दर से जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ वह ईरानी, यूनानी, कुषाणी के साथ साथ कैई विदेशी जातियों के बसने तक जारी रहा। इन सभी ने भारत को अपनाया और भारतीय संस्कृति कोसमृध्दि किया। भारतीय समाज ने भी इन्हें आत्मसात किया।

मुगलों ने भी इसी प्रकार से भारत को अपनाया और समाज को सुरक्षा तथा स्थिरता प्रदान किया। गलत एतिहासिक तख्तयों के आधार पर किसी भी गलत राजनीति दृष्टिकोण को प्रसय नहीं देना चाहिए और न ही साम्प्रदाइक के आधार पर समाज को बांटने वालों को इसकी इजाजत देनी चाहिए। ताज महल को सनसनी खेज मुद्दा बना कर, इसको साम्प्रदाइक रंग देना वास्तव में भारतीय अस्मिता पर प्रश्न उड़ाना है। हालाकि मुख्यमंत्री आदित्य योगी ने ताज महल की यात्रा करके, वहां सफाई अभियान में हिंस्सा लेकर इस विवाद को खत्म करने का प्रयास किया जो सराहनीय