रोहिंग्या संकट: पूरा हुआ साल अभी भी मदद की दरकार

  By : Rahul Tripathi | August 25, 2018 6:39 pm

न्यूयॉर्क। रोहिंग्या संकट को एक साल पूरा हो जाने के बाद समस्या को हल नहीं किया जा सका है। ऐसा मानना संयुक्त राष्ट्र संघ का है जो इस संकट के समाधान के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। साथ ही शरणार्थी वाले देशों के साथ मिल कर राहत कार्य कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व समुदाय से आर्थिक मदद की अपील की है। उसका कहना है कि अभी भी ऐसे हालात है कि आर्थिक मदद के बिना तमाम जिंदगी एक बार फिर से खतरे में आ सकती हैं।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने यह भी माना है कि लोगों को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। पिछले साल 25 अगस्त को ही म्यांमार सेना ने एक तरह से जातीय सफाए के लिए अभियान चलाया था। जिसके कारण करीब 700000 रोहिंग्या शरणार्थी हो गया है। इन शरणार्थियों में अधिकांश मुसलमान हैं।

रोहिंग्या शरणार्थियों के संकट के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन की आपातकालीन तैयारी एवं प्रतिक्रिया विभाग की महानिदेशक पीटर सलमा ने पत्रकारों को बताया है। उन्होंने बांग्ला देश के कोक्स बाजार स्थित रोहिंग्या के शरणार्थी शिविर के बारे में बताया कि यहां सारे इंतजाम के बाद भी भयंकर बीमारियां फैल रही हैं। जबकि महामारी से निपटने के लिए कई इंतजाम किए गए हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन बांग्ला देश सरकार के साथ मिलकर अब तक हजारों जान बचा चुकी है। सलमा ने बताया कि शरणार्थी शिविरों में खसरा, डिप्थीरिया, पोलियो, कालरा और रूबेला जैसी बीमारियां फैल रही हैं। हालांकि संगठन संक्रामक रोगों के शुरूवाती लक्षणों पर बराबर निगाह रखती है। लेकिन कुछ तो पर्यावरण के कारण और कुछ गंदगी, लोगों की भारी भीड़ के कारण महामारी का खतरा हमेशा बना रहता है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता की आवश्यता है।

रोहिंग्या संकट को लेकर आज हजारों लोगों ने शांतिपूर्ण मार्च निकाला। लोगों ने संयुक्त राष्ट्र से इंसाफ की गुहार लगाते हुए रैलियां की। गौरतलब है कि रोहिंग्या संकट का प्रारम्भ पिछले साल 25 अगस्त से प्रारम्भ हुआ। कुछ हथियार बंद रोहिंग्या लोगों ने म्यांमार पुलिस चौकियों पर हमला किया था। जिसके बाद सम्पूर्ण रखाइन प्रांत में हिंसा का दौर प्रारम्भ हो गया।

इस हिंसा से एक महीने के अंदर ही करीब 7000 हजार रोहिंग्या मारे गए। म्यांमार सेना ने रोहिंग्यों का क्रूरता की हद तक दमन किया। सेना की इस कार्रवाई को संयुक्त राष्ट्र ने जातीय सफाया की घटना के रूप में उल्लेख किया है। जिसके बाद कई लाख लोगों का अलग-अलग देशों में शरणार्थियों के रूप में पलायन हुआ।