पद्मावती विवाद: जानिए रानी पद्मिनी की असली कहानी

By Team Khabare Nov 17, 2017 7:46 pm

अश्विनी ‘सत्यदेव’

चित्तौड़ की रानी पद्मिनी पर बनी फिल्म पद्मावती के विवाद की आग राजस्थान के राजवाड़ो की गलियों से निकल कर अब समूचे देश में फैल गयी है। एक तरफ राजस्थानी राजपूत महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं लेकिन दूसरी तरफ वो अपनी रानी पद्मिनी के सम्मान के लिए एक दूसरी महिला के नाक को काटने की धमकी देते हैं। ये कैसी राजपु​तानी शान, दो अलग महिलाओं में फर्क रखता है। खैर, इस फिल्म को लेकर विवाद जारी है लेकिन हम आपके लिए कुछ खास लेकर आये हैं। हम आपको बतायेंगे कि, आखिर क्या वजह थी जो अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया था, और रानी पद्मिनी के जीवन की असली कहानी, तो तैयार हो जाइए एक ऐतिहासिक दौर के रोमांचक यात्रा के लिए।

चित्तौड़ की रानी पद्मिनी मूल रूप से सिंघल द्विप यानी की आज के श्रीलंका के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी थीं। रानी पद्मिनी का विवाह चित्तौड़ के राजा रतनसिंह के साथ हुआ था। बेहद ही खुबसूरत और बेबाक अंदाज वाली पद्मिनी के रानी बनते ही समूचे देश में उनकी चर्चा शुरू हो गयी थी। 

ये बात आज से कई सालों पहले की है, इतिहासकारों की माने तो ये वाकया 13 वीं -14 वीं सदी का है। हालांकि रानी पद्मिनी के बारे में ऐसा कहा जाता रहा है कि, उन्होनें जौहर किया था और एक अर्से से इतिहास की किताबों में ये कहानी दर्ज भी है। लेकिन इस बात की पूरी तस्दीक कहीं नहीं मिलती है सिवाय मलिक मुहम्मद जायसी की किताब पद्मावत के।

मलिक मुहम्मद जायसी की काव्य रचना पद्मावत में रानी पद्मिनी के बारे में हर बात का जिक्र काव्य के रूप में किया गया है। इस काव्य रचना को कई काल खंडो में बाटा गया है। ऐसा माना जाता है कि, रानी पद्मिनी बहुत खूबसूरत थी और उनकी खूबसूरती की चर्चा चित्तौड़ के बाहर अन्य रियासतों में भी होने लगी थी। धीमें धीमें ये बात दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी तक जा पहुंची। 

रानी पद्मिनी के रूप और गुणों की चर्चा सुनकर खिलजी हर कीमत पर रानी को पाना चाहता था। ऐसी अवधारणा भी है कि, उसने दर्पण में रानी का प्रतिबिंब देखा था और उसके सम्मोहित करने वाले सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गया था। 

रानी पद्मिनी और राजा रतन सिंह के विवाह के बारे में एक कथा और प्रचलित है वो ये है कि, पद्मिनी जब अपने मायके यानी की श्रीलंका में थीं उस वक्त उन्होनें एक तोता पाल रखा था जिसका नाम हीरामन था। एक दिन हीरामन घर से उड़ कर जंगल में चला गया जहां एक बहेलिए ने उसे अपने जाल में उसे फंसा लिया। उस तोते को बहेलिए ने एक ब्राम्हण के हाथों बेचा और वो ब्राम्हण जिसका आना जाना चित्तौड़ के किले में था। उस ब्राम्हण ने तोते को राजा रतनसिंह के हाथों बेच दिया। 

चूकी ये तोतो बोलता था और वर्षों तक पद्मिनी के पास रहा था तो वो चित्तौड़ के महल में पद्मिनी की खुबसूरती का बखान करता था। तोते द्वारा पद्मिनी की खुबसूरती के बारे में जानकर राजा रतन सिंह पद्मिनी को पाने की इच्छा से सिंहल देश गयें जहां पर उनका विवाह पद्मिनी से हुआ। पद्मिनी से विवाह के पूर्व भी राजा रतन सिंह विवाहित थें उनकी पहली पत्नी का नाम नागमती था।

खिलजी को रानी पद्मिनी के बारे में कैसे पता चला इसके बारे में कोई एक कहानी नहीं है। कुछ इतिहासकार ये मानते हैं कि उनके रूप की चर्चा हर ओर थी। वहीं कुछ मानते हैं कि, खिलजी ने एक दर्पण में रानी पद्मावती को देखा था। लेकिन इससे जुड़ी एक कहानी और भी चर्चा में है वो बिलकुल अलग है। ऐसा भी माना जाता है कि, जब पद्मिनी से विवाह करने के बाद राजा रतन सिंह चित्तौड़ वापस अपने महल में आये तों अपनी सभा में उपस्थित एक तांत्रिक को उन्होनें झूठ बोलने के आरोप में सभा से निष्कासित कर दिया था। उस तांत्रिक का नाम राघव था और बाद में वो तांत्रित अलाउद्दीन खिलजी की सभा में चला गया। यहीं पर राघव ने सुल्तान खिलजी को रानी पद्मिनी के रूप के बारे में बताया था।

जिसके बाद अलाउद्दीन पदमावती के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन सुनकर उसको प्राप्त करने के लिये लालायित हो उठा और उसने इसी उद्देश्य से चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। हमला करने के बाद उसने लंबे समय तक चित्तौड़ पर घेरा डाल रखा, किंतु कोई सफलता होती उसे न दिखाई पड़ी। इसलिये उसने धोखे से रतनसिंह को बंदी करने का उपाय बनाया। उसने उसके पास संधि का संदेश भेजा, जिसे रतन सिंह राजपूत ने स्वीकार कर अलाउद्दीन को विदा करने के लिये गढ़ के बाहर निकले, अलाउद्दीन ने उसे बंदी कर दिल्ली की ओर भाग निकला।

इधर चित्तौड़ के किले में रानी पद्मावती पति के वियोग में दुखी थी। इस दौरान वो अपने पति को छुड़ाने के लिए अपने सामंतों गोरा तथा बादल के घर गई। गोरा बादल ने रतनसिह राजपूत को मुक्त कराने के लिए सोलह सौ डोलियाँ सजाईं जिनके भीतर राजपूत सैनिकों को रखा और दिल्ली की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने यह कहलाया कि पद्मावती अपनी चेरियों के साथ सुल्तान की सेवा में आई है और अंतिम बार अपने पति रतन सिंह  से मिलना चाहती है। 

पद्मावती की इस योजना से अनजान सुल्तान ने डोलियों को प्रवेश की आज्ञा दे दी। जब डोलिया महल में आ गयी तो उनमें बैठे हुऐ राजपूतों ने बड़े ही चालाकी से महल में प्रवेश किया और राजा रतन सिंह को मुक्त करा लिया। इस दौरान कुछ सैनिकों को शक हुआ उन्होनें राजा रतन सिंह का पिछा किया लेकिन फिर भी वो सुरक्षित चित्तौड़ पहुंचने में सफल रहें। 

जब राजा रतन सिंह चित्तौड़ पहुंचे तो वहां पर उन्हें एक और नई जानकारी मिली। उनकी अनुपस्थिती में कुंभलनेर के राजा देवपाल ने पदमावती के पास एक दूत भेजकर उससे प्रेम प्रस्ताव दिया था। जब ये बात रानी पद्मावती ने राजा रतन सिंह को बताई। तो नाराज रतन सिंह तत्काल महल छोड़कर कुंभलनेर जा पहुंचे और वहां पर उन्होनें देवपाल को द्वंद युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें देवपाल की मृत्यु हो गयी। लेकिन इस युद्घ में राजा रतन सिंह भी बुरी तरह घायल हो गये थें।

जब राजा रतन सिंह चित्तौड़ पहुंचे तो घायल होने के कारण उनका इलाज शुरू हुआ। उस दौर के चिकित्सों ने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ दिनों के बाद राजा रतन सिंह की मौत हो गयी। जिसके बाद रानी पद्मावती और नागमती राजा के शव के साथ चितारोहण किया। 

ये वर्णन रीतिकाल के मशहूर कवि मलिक मोहम्मद जायसी की रचना पद्मावती में किया गया है। आपने उपर जो भी पढ़ा ये उसी के आधार पर लिखा गया है। जानकारों का मानना है कि, मलिक मोहम्मद जायसी की ये रचना वास्तविकता और कल्पनाओं का जोरदार मिश्रण हैं। अब इस रचना में कितनी सच्चाई है इसकी पुष्टी नहीं की जा सकती है। 

जानकारों के अनुसार, इस काव्य रचना में पद्मावती की कथा को एक आध्यात्मिक रूप में पेश किया गया है। कहा गया है कि चित्तौड़ मानव का शरीर है, राजा रतन सिंह उसका मन है, सिंहल यानी की श्रीलंका उसका हृदय है, पदमिनी उसकी बुद्धि है, तोता उसका गुरु है, नागमती उसका लौकिक जीवन है, राघव यानी की तांत्रिक शैतान है और अलाउद्दीन महज माया मात्र है। 

यदि आप पद्मावती को इस आधार पर समझते हैं तो आप समझ पायेंगे कि, रानी पद्मावती को अपने राजा रतन सिंह से किस कदर प्रेम था कि, उन्होनें उस वक्त से सुल्तान के मोह माया को भी अपने प्रेम के आगे छोटा कर दिया और अपने मृत पति के साथ ही जौहर करना उचित समझा। 

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