जानिए कौन थें पेरियार, जिन्होनें आजीवन किया ब्राम्हणों का विरोध

  By : Team Khabare | March 7, 2018 5:47 pm

अश्विनी ‘सत्यदेव’

नई दिल्ली। इस समय देश में मूर्तियों से प्रतिशोध लिया जा रहा है। विचारों से असहमत होने का बदला अर्से पहले दुनिया को अलविदा कह चुके महापुरूषों की निर्जीव मूर्तियों से लिया जा रहा है। किसी पर बुल्डोजर चढ़ रहा है तो किसी के मुख पर कालिख पुत रही है। बीते दिनों पूर्वोत्तर के राज्यों की सियासत में एक ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिला। 25 सालों के बाद त्रिपुरा में लेफ्ट के राज का अंत हो गया और लाल रंग बदल कर भगवा हो गया। इसके साथ ही लेनिन की मूर्ति को भी जमींदोज कर दिया गया। विचारों पर बुल्डोजर की ये मार पूर्वोत्तर होते हुए दक्षिण तक पहुंच गयी और तमिलनाडु के वेल्लूर ज़िले में पेरियार की मूर्ति को तोड़ा गया।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि, ये महज एक आम इंसान की सोच हो सकती है या फिर ये किसी राजनीति से प्रेरित नहीं है। भला सुबह शाम दो वक्त की रोजी में जुटे आम इंसान को उन मूर्तियों से क्या खतरा हो सकता है जो बीच चौराहे पर निर्जीव खड़े होकर परींदों की ‘बीट’ से भी खुद की रक्षा नहीं कर सकतें। ये खतरा उन मूर्तियों से नहीं बल्कि खुद की सोच और उन महापुरूषों के विचारों से हो सकता है जिन्होनें अब मूर्ति रूप ले लिया है।

हम आज उन्हीं में से एक व्यक्ति की बात करेंगे जिनकी मूर्ति को इंसानी सोच ने आपसी प्रतिशोध की बलि चढ़ा दिया। हम बात कर रहे हैं दक्षिण के उस पेरियार की ​जिसका विरोध उसके जीते जी भी हुआ जो आज मरने के वर्षों बाद भी जारी है। लेकिन अर्से से तमाम विरोधों के बावजूद भी ये मूर्ति चौराहे पर खड़ी थी जो कि, अपना नहीं बल्कि दूसरों को खुद उनका ही पता बताती थी। आइये जानते हैं कि, पेरियार की सोच घातक थी या फिर एक लोकतांत्रिक देश में उनके विचार भिन्न थें —

पेरियार यानी ‘पवित्र आत्मा’ —

जिस पेरियार की मूर्ति को जमींदोज किया गया है वो भी इसी भारतवर्ष की मिट्टी में जन्में और आगे चलकर उनके विचार दक्षिण की सियासत के डीएनए में बस गयें। पेरियार का असल नाम ई वी रामास्वामी था, वो तमिल राष्ट्रवादी, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उनके प्रशंसक उन्हें सम्मान देते हुए ‘पेरियार’ कहते थे। पेरियार का मतलब है ‘पवित्र आत्मा’ या ‘सम्मानित व्यक्ति’, जिनका सम्मान हर कोई करे।

ई वी रामास्वामी (इरोड वेंकट नायकर रामासामी) का जन्म 17 सितम्बर, 1879 को पश्चिमी तमिलनाडु के इरोड में गांव में हुआ था। शुरूआती दौर में इनकी पढ़ाई स्थानीय प्राथमिक विधालय में हुई। उसके बाद वो अपने पिता के व्यवसाय में जुड़ गयें। पेरियार के घर पर उस समय अधिकतर धर्म और प्रवचन होते रहते थें जिनमें पेरियार खुद हिस्सा लेते थें। लेकिन जब धर्म की बातें या फिर किसी कहानी पर चर्चा होती थी तो वो बेढ़ंगे सवाल पूछा करते थें। शुरूआती दौर में उनके परिजन इसे बचपना समझते थें, लेकिन बाद में उन्हें भी आभास हो गया कि पेरियार किताबी दुनिया से अलग एक वास्तविक और समानता की दुनिया में जीने वाले इंसान थें।

वो धर्म और धर्म से जुड़ी परंपराओं को पूरजोर विरोध करते थें। उनका ये मानना था कि, ये सभी कहानियां और प्रथाएं एक खास वर्ग द्वारा जान बूझकर बनायी गयी हैं ताकि वो अन्य लोगों पर इनका डर दिखाकर उन पर राज कर सकें। पेरियार बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह के विरुद्ध अवधारणा, स्त्रियों तथा दलितों के शोषण के पूर्ण विरोधी थे। जब पेरियार 19 वर्ष के हुए तब उनकी शादी नगम्मल नाम की स्त्री से हुई।बताया जाता है कि, उनकी पत्नी भी उनके विचारों से काफी हद तक प्रभावित थी।

घर छोड़ा और काशी गयें —

ये बात 1904 की है, पेरियार के पिता के एक ब्राम्हण मित्र थें। जिन पर कुछ अपराधिक मामला चल रहा था, उस दौरान पेरियार ने उनकी गिरफ्तरी में पुलिस की मदद की थी। ये बात पेरियार के पिता को पता चली जिसके बाद उनके पिता ने सबके सामने उनकी पिटाई की। इस बात से पेरियार काफी आहत हुए और अपना घर छोड़ कर काशी चले गयें। काशी में एक जगह निशुल्क भोज का आयोजन हुआ था। पेरियार को भी भोज में सम्मलित होने की इच्छा हुयी। लेकिन जब वो भोज में शामिल होने गयें तो उन्हें इस वजह से शामिल नहीं होने दिया गया क्योंकि वो भोज केवल ब्राम्हणों के लिए ही था।

पेरियार बने धर्म और ब्राम्हण विरोधी —

काशी की उस घटना ने पेरियार की जिंदगी में ऐसा परिवर्तन लाया कि, उन्होनें आजीवन किसी भी धर्म को न मानने का संकल्प ले लिया। इसके अलावा उन्होनें आजीवन ब्राम्हणों का विरोध किया। इसके बाद वो एक मंदिर में न्यासी बन गयें और फिर अपने शहर के नगरपालिका के प्रमुख बने। यहीं से उनका राजनीति में प्रवेश होना शुरू हुआ। सन 1919 में उन्होनें कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और फिर तमिलनाडु यूनिट के हेड भी बने।

कांग्रेस से भी मोहभंग —

कांग्रेस से जुड़ने के बाद वो काफी दिनों तक पार्टी में रहे। लेकिन इसी बीच एक ऐसी घटना हुयी जिसने कांग्रेस से भी उनका मोहभंग कर दिया। उस समय कांग्रेस ने युवाओं के लिए एक प्रशिक्षण शिविर चलाया था। जिसमें एक ब्राम्हण प्रशिक्षक द्वारा गैर-ब्राह्मण छात्रों के प्रति भेदभाव बरतते देख पेरियार ने उसका विरोध किया। जिसकी आगे कोई सुनवायी नहीं हुयी, इसी बात को लेकर उन्होनें कांग्रेस से अपना नाता खत्म कर दिया। सन 1925 में दलितों के समर्थन में पेरियार ने एक आंदोलन चलाया। उसके बाद उन्होनें 1944 में ‘द्रविदर कड़गम’ नाम से एक पार्टी बनायी। लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होनें अपने से 20 साल की कम उम्र की महिला से विवाह किया। इसी बात को लेकर उनकी पार्टी में विद्रोह शुरू हो गया और उनके समर्थक उनसे अलग हो गयें। जिसके बाद एक नयी पार्टी का उदय हुआ जिसका नाम डी एम के (द्रविड़ मुनेत्र कळगम) रखा गया।

हिंदी के विरोध ने दिलायी लोकप्रियता —

उस वक्त के गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जिन्हें राजाजी के नाम से भी जाना जाता था। उन्होनें तमिलनाडु में हिंदी की शिक्षा को अनिवार्य करने की घोषणा की। इस बात का पेरियार ने खुलकर विरोध किया और जगह जगह जन आंदोलन भी किये। हिंदी के विरोध में खुलकर खड़े होने के कारण द्रविणों में उनकी पैठ बन गयी और उन्हें खासी लोकप्रियता मिली।

आजीवन ब्राम्हणों का विरोध किया — कुछ प्रमुख कथन:

पेरियार ने आजीवन ब्राम्हणों का विरोध किया, उनका मानना था कि, ब्राम्हण समाज को धर्म और अंधविश्वास के पॉश में बांध कर रखना चाहते है। पेरियार ने अपने एक कथन में कहा था कि, ‘आज विदेशी लोग दूसरे ग्रहों पर संदेश और अंतरिक्ष यान भेज रहे हैं, हम ब्राह्मणों द्वारा श्राद्धों में परलोक में बसे अपने पूर्वजों को चावल और खीर भेज रहे हैं, क्या ये बुद्धिमानी है?’

इसके अलावा उन्होनें ये भी कहा कि, “आप अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई क्यों इन मंदिरों में लुटाते हो। क्या कभी ब्राह्मणों ने इन मंदिरों, तालाबों या अन्य परोपकारी संस्थाओं के लिए एक रुपया भी दान दिया है।”

उन्होनें कहा कि, “ब्राह्मण हमें अंधविश्वास में निष्ठा रखने के लिए तैयार करता है। वो खुद आरामदायक जीवन जी रहा है, तुम्हे अछूत कहकर निंदा करता है। मैं आपको सावधान करता हूं कि उनका विश्वास मत करो। ब्राह्मणों ने हमें शास्त्रों ओर पुराणों की सहायता से गुलाम बनाया है। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंदिर, ईश्वर,और देवी-देवताओं की रचना की। सभी मनुष्य समान रूप से पैदा हुए हैं तो फिर अकेले ब्राह्मण उच्च व अन्य को नीच कैसे ठहराया जा सकता है?”

क्या पेरियार की सोच ही है उनकी मूर्ति ढाहने की असल वजह —

इस बात पर चर्चा करना कि, क्या पेरियार की सोच ही उनके मूर्तियों की दशा की असल वजह है, ये थोड़ा कठिन होगा। क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब उसमें विचारों, संस्कृतियों, आस्था की भिन्नता हो। अन्यथा किसी भी राष्ट्र में एक ही सोच और एक ही आस्था का प्रभाव उसे धीमें धीमें तानाशाही की तरफ ले जाता है। अंधकार के होने से ही प्रकाश का महत्व है, प्रकाश की अपनी कोई छाया नहीं होती है। लेकिन आज के समय में लोकतंत्र में अपने भीतर छिपे वास्तविक वैचारिक दुश्मनों के बजाय मूर्तियों से प्रतिशोध लिया जा रहा है। अपने आखिरी वक्त में महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने फांसी से पहले लेनिन को ही पढ़ा था और आज उनके विचार रूपी मूर्तियों को जमींदोज किया जा रहा है।

किसी की जीवनी पढ़कर उनका अनुपालन करने के बजाय, उससे अपने विचारों का निर्माण करना ज्यादा उचित है। वो उनका दौर था, उनका जीवन था जो उन्होनें अपने हिसाब से जिया लेकिन ये आपका दौर है और इसे आप कितना बेहतर बना सकते हैं, इसके जिम्मेदार महज आप है। कोई लेनिन और पेरियार नहीं।

हो सकता है कि, आप हमारे विचारों से सहमत न हो। लेकिन हमने महज पेरियार के वास्तविक जीवन का परिचय दिया है। इससे आप कितना रसूख रखते हैं ये आपके विचारों पर निर्भर है।