जानिए क्या है ‘चिपको आंदोलन’ जिसे आज गूगल भी कर रहा है याद

  By : Team Khabare | March 26, 2018 12:53 pm

अश्विनी ‘सत्यदेव’

नई दिल्ली। देश के इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए है जिनका अपना एक अलग ही अंदाज और उद्देश्य रहा है। असहयोग आंदोलन, स्वतंत्रता आन्दोलन, क्रन्तिकारी आन्दोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे कई ऐसे नाम इतिहास में दर्ज है। इसी फेहरिस्त में एक और नाम शुमार है जिसे देश ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से जानता है। इस आंदोलन की शुरूआत आज ही के दिन हुई थी जिसे गूगल भी याद कर रहा है। हम आपको अतीत के पन्नों में जब्त उस दस्तां को बतायेंगे कि, किस तरह एक महिला की सोच ने इसे जन आंदोलन में बदल दिया और जिसके दृण निश्चय के आगे मर्दों की विशाल सेना को भी नत मस्तक होना पड़ा। जानिए क्या है चिपको आंदोलन —

जैसा कि, आप इस आंदोलन के नाम से ही अंदाजा लगा चुके होंगे कि, ये आंदोलन किसी चीज से चिपकने के विषय पर आधारित है, आप सही भी हैं। जिस तरह कोई भी आंदोलन शुरूआत में महज एक विरोध की आवाज होती है वैसे ही ये भी एक कंठ से निकली हुई वाणी मात्र ही था, लेकिन समय ने इसे वो शक्ति दी जिसने इसे एक आंदोलन का रूप दे दिया।

ये बात आजादी के कई वर्षों पूर्व सन 1927 की है, देश में पहली बार ‘वन अधिनियम 1927’ को लागू किया गया था। इस अधिनियम के कई कानून ऐसे थें जो कि, वनों में रहने वाले आदिवासी जनजातियों आदि के खिलाफ थें। यानी की इन नियमों का सीधा असर उनके दैनिक जीवन पर पड़ने वाला था। चूकिं अधिनियम लागू कर दिया गया था तो इसका विरोध होना भी लाजमी थी। हुआ भी वैसा ही, उस वक्त के टिहरी जिले में जो अब उत्तराखंड के जंगलों में रहने वाले स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। सन 1930 में टिहरी में एक बड़े ही भव्य रैली का आयोजन किया गया और वन अधिनियम के कड़े नियमों का विरोध किया गया।

आग सुलग चुकी थी —

वन ​अधिनियम के खिलाफ जंगलों में रहने वाले और पर्यावरण से प्रेम करने वालों के सीने में एक आग सुलग चुकी थी। उस वक्त महात्मा गांधी की एक शिष्या सरला बेन भी सन 1961 में इस विरोध को एक अभियान का रूप दिया और देश भर के लोगों को इस अभियान से जोड़ने का फैसला किया। 30 मई 1968 तक देश भर के कई आदिवासी समूह और पर्यावरण के रक्षक इस मुहिम से जुड़ गयें और देश भर में कई जगहों पर अलग अलग आंदोलन होने लगें। तब तक ये मुहिम छोटे छोटे मशालों की तरह अलग अलग जगहों पर जल रही थी। इसका असली ज्वाला बनना अभी बाकी थी।

जब चिंगारी बनी विरोध की महाज्वाला —

देश भर के उन सभी हिस्सों में जहां कहीं भी जंगल और वन थें वहां तलक इस अधिनियम के विरोध की बात पहुंच चुकी थी। लेकिन उस वक्त तक भी सब कुछ बेहद ही शांत था। लेकिन सन 1974 में वन विभाग ने जोशीमठ के रैणी गांव में स्थित 680 हेक्टेयर जंगल को एक ठेकेदार के हाथों नीलाम कर दिया। इस नीलामी का मुख्य उद्देश्य जंगल को काटकर मैदान में बदलना था। इसके लिए रैणी गांव के कुल 2459 पेड़ों को चिन्हीत किया गया था। जंगल के पेड़ों पर निशान लगाये जा चुके थें।

वनों में रहने वाले भी विभाग की मंशा को समझ चुके थें। वो इस बात से वाकिफ हो गये थें कि, जिन पेड़ो पर निशान लगाये जा चुके हैं उन्हें जल्द ही काट दिया जायेगा। वो समय भी आया जब लोगों को एकजुट होना था, 23 मार्च सन 1974 को गोपेश्वर में पेड़ों के कटान के विरोध में एक विशाल रैली का आयोजन किया गया। इस रैली का नेतृत्व एक महिला जिनका नाम ‘गौरा देवी’ था, उन्होनें किया।

वन विभाग ने चली चाल —

वन विभाग जगह जगह पर हो रहे रैलियों और विरोध प्रदर्शन से अवगत था। वो जानते थें कि, यदि अचानक से गांव में घुस कर पेड़ों की कटान शुरू की गयी तो उन्हें ग्रामिणों के कोप का भाजन बनना पड़ेगा। क्योंकि ये सर्वविदित है कि, वनों में रहने वालों की असल पूजी वन ही होती है। इसके लिए वन विभाग ने एक सुनियोजि चाल चली। विभाग की तरफ से पेड़ों के कटान के बाद ग्रामिणों को मिलने वाले मुआवजे की तारीख तय की गयी, वो तारीख थी 26 मार्च। विभाग की योजना के अनुसार मुआवजे का वितरण चमोली जिले से किया जाना था। विभाग इस बात से अवगत था कि, इस दिन गांव के सभी पुरूष चमोली में रहंगे और गांव में विरोध करने वाला कोई भी नहीं होगा।

जब महिलाओं ने संभाला मोर्चा —

‘गौरा देवी’

आज का ही दिन था 26 मार्च, वन विभाग ने अपनी योजना के अनुसार स्थानीय समाजिक कार्यकर्ताओं को एक वार्ता के लिए जिले पर बुला लिया था और मजदूरों के समूह को गांव की तरफ रवाना कर दिया था। एकमात्र लक्ष्य था चिन्हीत पेड़ों का कटान। लेकिन इसी बीच मजदूरों के आवागमन की जानकारी एक लड़की को लग गयी। उसने इस बात की सूचना तत्काल गांव के गौरा देवी को दी। गांव से सभी पुरूष चमोली जा चुके थें। पेड़ों की रक्षा करने वाला या फिर विभाग का विरोध करने वाला कोई भी रैणी गांव में नहीं था।

लेकिन गौरा देवी ने हिम्मत नहीं हारी उन्होनें गांव के सभी महिलाओं को एकत्र किया और पेड़ों की रक्षा की जिम्मेदारी अपने उपर ली। उन्होनें महिलाओं को इस बात के लिए राजी किया कि, चाहे कुछ भी हो जाये, हमारी जान ही क्यों न चली जाये लेकिन हम अपने जीते जी पेड़ों को कटने नहीं देंगे। बताया जाता है कि, उस वक्त गांव में महज 21 महिलायें और कुछ बच्चे ही मौजूद थें। उन सभी को लेकर गौरा देवी जंगल की तरफ निकल पड़ी। दूसरी ओर मजदूरों की टोली और विभाग के लोग जंगल पहुंच रहे थें।

इस दौरान गौरादेवी का सामना विभाग के लोगों से हुआ, विभाग के लोगों ने गौरा देवी को समझाने का प्रयास किया। लेकिन वो अपने फैसले पर अडिग रहीं, यहां तक कि, उन्हें डराया और धमकाया गया लेकिन उन्होनें अपना फैसला साफ तौर पर सुना दिया और जंगल के एक पेड़ से जाकर लिपट गयीं। उन्हें देखकर उनके साथ आयी हुई सभी महिलाएं एक एक करके चिन्हीत पेड़ों से ऐसे लिपटी जैसे एक बच्चा अपनी मां से, या मां अपने बच्चे से लिपट जाती है।

विभाग के लोगों को इस विरोध का अंदाजा भी नहीं था। वो तय नहीं कर पा रहे थें कि, आखिर पेड़ों को किस तरह काटा जाये। लाख प्रयास के बावजूद उन महिलाओं ने पेड़ों को नहीं छोड़ा और तब तक चिपकी रहीं जब तक विभाग के लोगों का हौसला नहीं टूट गया। आखिरकार वन विभाग, ठेकेदार और मजदूरों को बैरंग वापस लौटना पड़ा और यहीं से शुरूआत हुई उस महाज्वाला की जिसे दुनिया ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से जानती है।

एक साधारण सी दिखने वाली महिला ‘गौरा देवी’ के हिम्मत के आगे मर्दों की टोली का बैरंग लौटना इस बात का पुख्ता सबूत था कि, ये विरोध जल्द ही आंदोलन में बदलने वाला था। ये खबर चारो तरफ फैल गयी और अलकनंदा से उठे विरोध के इस बुलंद आवाज ने नैनीताल, अल्मोडा हर जगह घर कर लिया।

बाद में टिहरी से सुंदरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन को हवा दी। उन्होनें जन समूह के साथ सन 1981 से 1983 तक 5000 किलोमीटर ट्रांस हिमालय पदयात्रा की। इतना ही नहीं, इस आंदोलन को उन्होनें भव्य रुप दिया और वो आमरण अनशन पर भी बैठें। उनकी मांग थी कि, इस इलाके में वनों की कटाई को रोक दिया जाये। लोगों के तमाम विरोध और आंदोलन के बाद आखिरकार सरकार को घुटने टेकने पड़े और सरकार ने अगले 20 वर्षों तक इस इलाके में पेडों की कटाई पर रोक लगा दिया।

‘चिपको आन्दोलन’ का घोषवाक्य —

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।

मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।

सन 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया था।