पानी पर रार: भारत और पाकिस्तान

  By : Rahul Tripathi | June 7, 2018

राहुल त्रिपाठी

भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते हुए तनाव और गोलाबारी के बीच एक और विवाद तेजी के साथ बढ़ रहा है। जिसकी गंभीरता गोलों और गोलियों की आवाज के बीच शायद कम सुनाई पड़ी या फिर उसपर लोगों का ध्यान ही नहीं गया। लेकिन यह सीमा विवाद से भी अधिक महत्वपूर्ण और खतरनाक है। यह विवाद है पानी को लेकर, पाकिस्तान का ऐसा आरोप है कि भारत उनका पानी रोककर हमारे देश को मरूस्थल में बदलने का कुचक्र रच रहा है। इस मसले को लेकर पाकिस्तान ने एक विवादास्पद बयान देकर इसकी भयावक्ता को और बढ़ा दिया है। जिसमें पाकिस्तान ने कहा है कि यदि भारत की तरफ से हमारे पानी को रोका गया तो हम परमाणु हमला करने से भी नहीं हिचकिचाएंगे।

पाकिस्तान के इस वक्तव्य के पीछे प्रधानमंत्री मोदी का वह बयान है। जिसमें प्रधानमंत्री ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को समर्थन देने की नीति की आलोचना करते हुए कहा था कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता है। इस कथन के पीछे प्रधानमंत्री का कहना था कि या तो पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम लगाए या फिर भारत कठोर कदम उठते हुए पाकिस्तान जाने वाले पानी पर रोक लगा देगा। ऐसा नहीं हो सकता कि पाकिस्तान एक तरफ तो भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकी भेजे और हम भारत से होकर जाने वाले पानी को बराबर निर्वाध रूप से पाकिस्तान जाने दे।

हालांकि भारत-पाकिस्तान के बीच जल विवाद काफी पुराना है। या यूं कहें कि यह समस्या आजादी के साथ ही प्रारम्भ हुई। वास्तव में पाकिस्तान के निर्माण में पुराने पंजाब का एक बहुत बड़ा भौगोलिक क्षेत्र सम्मिलित है। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार भारत में सर्वप्रथम नहरों का निर्माण आज के पाकिस्तान वाले पंजाब के हिस्से में मध्यकालीन इतिहास में सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के शासन काल में ( 1320-25) सरहिन्द में बनाया गया था। इसके बाद फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल में नहरो को और विकसित किया गया। सुल्तान फिरोज ने न केवल नहरों का निर्माण और विकास किया बल्कि उसने दिवाने शर्क नाम का एक सिचाई कर भी लगाया था।

आधुनिक समय में ब्रिटिश शासन के दौरान जब सर हेनरी पंजाब के गवर्नर बने तो उन्होंने पंजाब में कृषि विकास के लिए नहरों का बड़े पैमाने पर निर्माण कराया। पंजाब पांच नदियों से घिरा मैदान होने के कारण पहले से ही नहरों के निर्माण के लिए आदर्श था। साथ ही बारिस की कमी के कारण नहरों के द्वारा सिचाई के साधनों का विकास करना पंजाब के लिए मजबूरी भी थी। लेकिन आजादी के बाद जब भारत-पाकिस्तान के बीच बंटवारा हुआ तो अधिकांश नहरों वाला पंजाब पाकिस्तान के हिस्से में आ गया।

जबकि नदियों वाला हिस्सा भारत के सीमा में रह गया। ऐसी स्थिति में दोनों देशों के बीच नदियों के पानी के अधिकार को लेकर विवाद शुरू हो गया। यह विवाद और भी बढ़ गया जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्य से देश की कृषि व्यवस्था को सुधारने तथा कृषि उत्पादन को बढ़ने के लिए सिचाई के संसाधनों के विकास पर ध्यान केन्द्रित किया। इसके लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि सिचाई के संसाधनों के विकास के लिए बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं को प्रारम्भ किया गया।

इस परियोजना के अन्तर्गत भारत में नदियों पर बांधों की श्रृंखला स्थापित की गयी। इन बांधों से नहरें निकाल कर सिचाई की समस्या को दूर करने का प्रयास किया गया। इन योजनाओं में प्रमुख भाखड़ा-नंगल परियोजना है जो सतलुज नदी पर हिमांचल प्रदेश में बनाया गया। यह भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है। इसके जरिए पंजाब, राजस्थान तथा हरियाणा के पानी की समस्या का समाधान किया गया। इन बांध परियोजना के शुरू होने के साथ ही भारत पाकिस्तान के बीच पानी का विवाद और बढ़ने लगा। क्योंकि भारत में पानी का दोहन बढ़ने से पाकिस्तान की सिंचाई प्रभावित होने लगी और उसका सिंचाई की समस्या के साथ साथ सूखे का भी भय सताने लगा।

पाकिस्तान इस विवाद को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ गया। संघ के सुझाव से इस विवाद को विश्व बैंक की मध्यस्थता से सुलझाने का प्रयास किया गया। इसके जरिए भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिन्धु समझौता किया गया। इस संधि की शर्तों के अनुसार सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के पानी को दोनों देशों के बीच बांट दिया गया। प्रमुख नदी सिन्धु, सहित चिनाब और झेलम पाकिस्तान को तथा सतलुज, रावी और व्यास भारत को दिया गया। भारत के हिस्से वाली नदियों का प्रवाह कम होने के कारण पाकिस्तान के हिस्से वाली नदियों के 20% पानी इस्तेमाल करना का अधिकार भारत को मिला।

लेकिन अभी तक इस संधि के प्रावधानों से पाकिस्तान लाभ की स्थिति में रहा है। क्योंकि भारत अपने हिस्सा की नदियों का पानी पूरी तरह से नहीं उपयोग कर रहा था और इनका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान को चला जाता रहा है। लेकिन अब भारत सरकार ने इसको पूरी तरह से रोक कर पाकिस्तान को आतंकवाद पर दबाव बढ़ाना चाहता है। पंजाब स्थित हरिके बैराज से पाकिस्तान जाने वाले इन नदियों के पानी को रोक दिया गया है। इसके अतिरिक्त भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए संधि की शर्तों के अनुसार चिनाब और झेलम नदियों में कई हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बना रहा है।

सिन्धु समझौते पर भारत-पाकिस्तान के हालिया विवाद का कारण भारत की किशनगंगा परियोजना है। जो सिन्धु की सहायक नदी किशनगंगा पर बनाया जा रहा है। इस परियोजना के जरिए भारत वूलर झील में ताजे पानी की आपूर्ति को बनाए रखना है। साथ ही जलविद्युत उत्पादन का भी लक्ष्य रखा गया है। पाकिस्तान इसको आधार बनाकर भारत पर सिन्धु समझौते के उल्लंघन का आरोप लगा रहा है। हालांकि भारत का इस संबंध में कहना है कि वह इस संधि के शर्तों के आधार पर ही परियोजना का निर्माण कर रहा है।

साथ ही भारत इस परियोजना को लेकर पाकिस्तान के संदेह को दूर करने के लिए एक स्वतंत्र परिवेक्षक की नियुक्ति का भी सुझाव रखा है। लेकिन पाकिस्तान इससे सहमत नहीं है औऱ वह इस मसले को विश्व बैंक के समक्ष ले गया। विश्व बैंक ने पाकिस्तान की मांग के अनुसार इस प्रोजेक्ट को रोकने से मना कर दिया है। साथ ही पाकिस्तान को भारत के सुझाव पर विचार करने की सलाह दी है। अत: पाकिस्तान, भारत के इस प्रोजेक्ट को लेकर जो हठधर्मिता का जो रुख अपना रखा है, उसमें उसकी और अधिक बदनामी हुई है।