उत्तर प्रदेश को है ‘रिटर्न गिफ्ट’ का इंतजार

By Pradeep Shukla Apr 30, 2018 9:04 pm
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संजय मोहन, पूर्व शिक्षा निदेशक, उत्तर प्रदेश

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद उत्तर प्रदेश की जनता के मन में असीमित आकांक्षाओं का जन्म लेना स्वाभाविक था। प्रदेश की जनता की यह अपेक्षा बेमानी नहीं थी। विश्वास था कि नई सरकार बनने के बाद उनको रिटर्न गिफ्ट देने के लिए सरकार अनेक अच्छे फैसले लेगी, जिनका लाभ समाज के विभिन्न वर्गो को मिलेगा। लेकिन पिछले एक वर्ष में कुछ खास विकास नजर नहीं आया।

यदि बेरोजगारी से जुड़े मुद्दों की बात की जाये तो सरकार द्वारा गठित विभिन्न आयोग अभी तक एक भी व्यक्ति को रोजगार नहीं दे सके। एक वर्ष बीत गया लेकिन सरकार माध्यमिक शिक्षा चयन बार्ड का गठन तक नहीं कर सकी। शिक्षक बनने की तमन्ना संजोये लाखों शिक्षित बेरोजगारों के सपने अभी तक अधूरे हैं। गरीबी और बदहाली की जिन्दगी जी रहे यह लाखों नौजवान रोटी की लड़ाई में भी अपने को हारता पा रहे हैं। सरकार की इस घोषणा ने आग में घी का काम किया कि शिक्षकों के नियमित चयन की व्यवस्था होने तक सेवा निवृत्त शिक्षकों को मानदेय पर तैनात कर पढ़ायी कराई जायेगी। जिस प्रदेश में करोड़ों नौजवान बेरोजगार हों उनको समय से रोजगार मुहैया कराने में असफल सरकार ऐसी घोषणायें कर कौन सा संदेश देना चाहती है? क्या सरकार को यह नहीं मालूम कि शिक्षकों की बेहद कमी के कारण पटरी से उतरी शिक्षण व्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर खड़ी है? कितना विचित्र परिदृश्य है? एक ओर शिक्षकों के हजारों पद रिक्त होने के कारण शिक्षण व्यवस्था ठप होने को है, वहीं दूसरी ओर हजारों बेरोजगार शिक्षक बनने की कतार में लम्बे समय से खड़े हैं।

उपचुनाव में अप्रत्याशित हार के बाद सरकार सकते में है। कदाचित इसी कारण अब एक वर्ष से अधिक की प्रतीक्षा के बाद सरकार ने आनन-फानन में माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के गठन की घोषणा कर दी है। क्या चयन बोर्ड का गठन मात्र हजारों बेरोजगारों को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त है? चयन बोर्ड द्वारा शिक्षकों के चयन की वर्तमान प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इसे एक वर्ष से पहले पूरा करना संभव नहीं है। विषयवार/विद्यालयवार रिक्तियों की सूचना प्राप्त करने की वर्तमान व्यवस्था नितांत अव्यवहारिक और श्रमसाध्य है, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में प्रवक्ता एवं एल. टी. के शिक्षकों की विषयवार अनुमानित रिक्तियों के डेढ़गुना पदों पर चयन कर चयनबोर्ड को एक पैनल तैयार करना चाहिए। जब किसी विद्यालय में किसी विषय की कोई रिक्ति हो तो पद रिक्त होने से पहले शिक्षक का ब्योरा विद्यालय को उपलब्ध करा देना चाहिए। ताकि शिक्षण कार्य प्रभावित न हो। यदि यह संदेश देना है कि बेरोजगारी की समस्या के प्रति सरकार गंभीर और संवेदनशील है तो विशेष अभियान चलाकर मिशन मोड में शिक्षकों की भर्ती का कार्यक्रम चलाना होगा।

पिछली सपा सरकार में शिक्षामित्रों को प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक बनाने के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त करने पर उन्हें अपने पुराने पद पर लौटना पड़ा। भाजपा सरकार ने तत्काल शिक्षक पात्रता परीक्षा (टी.ई.टी) के आयोजन की घोषणा कर अपनी नेक नियति का परिचय दिया। संर्घषरत शिक्षा मित्रों में यह उम्मीद जगी कि यदि वह परीक्षा उत्तीर्ण कर लेंगे तो वे शिक्षक के पद पर पुर्नस्थापित हो जायेंगे। कदाचित सरकार को शिक्षा मित्रों के आशा की यह किरन रास नहीं आयी। सरकार ने उस समय यह निर्णय लेकर सबको चौंका दिया कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक के पद पर चयन हेतु एक लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। जिसमें टी.ई.टी उत्तीर्ण शिक्षा मित्रों को भी सम्मिलित होना होगा। इतने वर्षों के शिक्षण अनुभव के उपरान्त यदि शिक्षामित्र परीक्षा उत्तीर्ण कर पुनः शिक्षक बन जाते, तो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का भी समादर हो जाता।

देश में कदाचित उत्तर प्रदेश अकेला ऐसा राज्य होगा जिसमें प्रदेश के राजकीय तथा सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में कम्प्यूटर शिक्षक का एक भी पद सृजित नहीं है। आज जब कम्प्यूटर मानव जीवन का अभिन्न अंग बन गया है और इस विषय का महत्व गणित व हिन्दी जैसे विषयों से अधिक न हो, तो कम भी नहीं है। नियमित व पूर्णकालिक कम्प्यूटर शिक्षकों के अभाव में अनेक छात्र चाहकर भी कम्प्यूटर शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते, जिससे यह छात्र अन्य बोर्डों के विद्यालयों में पलायन कर रहे हैं। पूरे प्रदेश में शिक्षकों के इतने सरप्लस पद हैं जिनको कम्प्यूटर विषय में परिवर्तित कर अतिरिक्त व्यय-भार से बचा जा सकता है। देश के सबसे आबादी वाले राज्य के विद्यालयों की इस बदहाली पर शासन कब तक आंख मूंदे रहेगा?

दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए माध्यमिक शिक्षा परिषद (यू.पी. बोर्ड) की वर्ष 2018 की हाईस्कूल एवं इंटर की परीक्षाओं को नकल विहीन बनाने के लिए सरकार ने विद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे लगवाने, एसटीएफ सहित सम्पूर्ण जिला प्राशासन की मशीनरी को नकल रोकने के लिए इस्तेमाल किया। प्रशासन की सख्ती के कारण लगभग 11 लाख परीक्षार्थियों ने बीच में ही परीक्षा छोड़ दी।

सरकार का यह प्रयास उनकी साफ नियत की ओर तो संकेत करता हैं, पर यह प्रयास नकल को आंशिक रुप से रोकने में ही सफल हुआ। यह पूरी तरीके से नकल की बीमारी का उपचार करने में सक्षम नहीं हो सका। हर वर्ष नकल रोकने के लिए इतना अथक प्रयास करना क्या संभव होगा? नकल रोकने से पहले उसके कारण पर ध्यान देना होगा। इसको पूर्णतया रूप से रोकने के लिए हमें विद्यालयों की शिक्षण में गुणत्मक सुधार करना होगा।

यह निर्विवाद सत्य है कि प्रदेश में नकल माफियाओं का धंधा आज सैकड़ों करोड़ों रुपये तक पहुंच गया है। राजनैतिक दबाव में मानक ​तथा आवश्यकताओं को अंदेखा करते हुए पिछले तीन दशकों में हजारों विद्यालयों को मान्यता प्रदान की गयी। यह मान्यताएं नकल माफियों और दबंग राजनेताओं की जुगलबंदी का परिणाम थी। वैसे तो नकल के लिए प्रसिद्ध जिलों की सूची काफी लंबी है, लेकिन विशेष रूप से अलीगढ़, गाजीपुर, कौशाम्बी और गोंडा का नाम इसमें प्रमुख रुप से लिया जा सकता है। ऐसे जिलों की एक—एक तहसील में सैकड़ों विद्यालय मान्यता प्राप्त कर नकल का धंधा धड़ल्ले से चला रहे हैं। उदाहरण के लिए अलीगढ़ की अतरौली तहसील में लगभग हर 500 मीटर पर एक माध्यमिक विद्यालय है। जिनमें बमुश्किल 2—4 अर्धनिर्मित कक्षा कक्ष बने हुए हैं और उन विद्यालयों में प्रति वर्ष सैकड़ों परीक्षार्थी हर साल रेगुलर परीक्षार्थी के रूप में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न यह है कि बिना शिक्षण कक्षों के कहां और कब छात्रों को शिक्षा दी जाती होगी और वहां कक्षा 10 एवं 12 के अतिरिक्त अन्य कक्षाएं भी तो संचालित होती होंगी? उत्तीर्ण कराने के निर्धारित रेट पर हरियाणा, दिल्ली और नेपाल तक से छात्र भी यहां परीक्षा देने आते हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि वहां पर नाम मात्र की आबादी है, इसलिए परीक्षार्थियों के लिए अस्थायी धर्मशालाओं और ढाबों की व्यवस्था परीक्षा अवधि में बड़े पैमाने पर की जाती है। परीक्षा अवधि में खाली समय में परीक्षार्थियों के मनोरंजन के लिए वीसीआर पर फिल्में दिखाने का धंधा भी जोरों पर चलता है।

सरकार को दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए मानक एवं आवश्यकता की अनदेखी कर मान्यता प्राप्त करने वाले विद्यालयों की मान्यता विधिक तरीके से समाप्त करनी होगी। प्रदेश में ऐसे विद्यालयों की संख्या 3 से 4 हजार है। ऐसे विद्यालयों की पहचान करने के लिए गत तीन वर्षों में संस्थागत (रेगुलर) परीक्षार्थी के रुप में सम्मलित परीक्षार्थियों की संख्या के सापेक्ष विद्यालय में उपलब्ध भवन सहित भौतिक संसाधनों की जांच कराकर किया जा सकता है। प्रथम चरण में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में नकल के लिए सबसे ज्यादा बदनाम 5 जिलों को इसके​ लिए चयनित किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री कहते हैं कि 21वीं सदी हिन्दुस्तान की सदी है, क्योंकि यह दुनिया का सबसे नौजवान देश है। 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से ऊपर की है। देश जवान है, सपने जवान हैं और संकल्प भी जवान है। देश के लिए मर मिटने वाले भी जवान हैं। प्रधानमंत्री के कथन की पुष्टि उपलब्ध आंकड़े करते हैं। फिक्की के अनुसार 2030 तक भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ते हुए 10 खरब डॉलर के पार हो जाएगी। साथ ही इस समय तक लगभग 25 करोड़ की गुणात्मक श्रम शक्ति की आवश्यकता होगी। लिहाजा, एक बड़े स्तर पर दक्ष श्रमिकों की फौज खड़ा करके भारत अकेले दम पर पूरे विश्व की आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा।

इन आंकड़ों के परिपेक्ष में यदि उत्तर प्रदेश के वर्तमान परिदृश्य पर नजर डाली जाए, तो आज ग्रामीण भारत के युवा का सबसे बड़ा सपना सरकारी नौकरी प्राप्त करना है, चाहे वह चपरासी की ही क्यों न हो। हमारे ग्रामीण युवकों में रोजगार, स्वनिर्भरता की सोच अभी त​क विकसित नहीं हो सकी है। उन्हें यह बताने से हम चूक गए कि सरकारें मार्गदर्शक के रूप में हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार को गम्भीरता से कौशल विकास के कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है। प्रदेश सरकार को भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ किये गए राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन, राष्ट्रीय कौशल और उद्यमिता नीति, प्रधानमंत्री कौशल विकास मिशन और कौशल ऋण योजना का अधिकतम लाभ प्रदेश के युवकों को देना होगा।

प्रदेश के जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने और अपने साख को बनाए रखने के लिए सरकार के पास अब बहुत वक्त नहीं है। सबसे पहले सरकार को अपनी दो प्रमुख खामियों से उबरना होगा। पहली, मुख्यमंत्री सहित पूरी सरकार आत्ममुग्ध है कि वह बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। विपक्षी पाटियों को छोड़कर आज भी बहुत से लोग सरकार की नीयत पर सवाल नहीं कर रहे हैं। अनुभव की कमी और जानकारी के अभाव में सरकार मन माफिक निर्णय नहीं ले पा रही है। अपनी पीठ खुद थपथपाने के स्थान पर सरकार को शीघ्र ही ऐसा कुछ करना होगा कि प्रदेश की जनता को लगे कि बीजेपी के पक्ष में मतदान करके उन्होंने कोई गलती नहीं की थी।

दूसरी खामीं, यह कि सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप से बचने के लिए कोई निर्णय लेने से कतरा रहे हैं। और अपना काम दूसरों पर इस आशय से ठेल रहे है कि स्वयं कोई निर्णय नहीं लेगें तो उनपर कोई आरोप क्यों लगेगा? नतीजा यह है कि बहुत से विभाग पंगु हो गये हैं। और यह खुलकर कहा जाए, तो कुछ विभागों में निम्न स्तर के रिक्त पदों पर नियमों को बदलकर चयन का अधिकार लोकसेवा आयोग और अन्य आयोगों को सौप दिया गया है। सभी जानते हैं कि इन आयोगो की चयन प्रक्रिया कितनी जटिल और श्रम साध्य होती है। पहले यह चयन विभागीय स्तर पर सरलता और शीघ्रता से हो जाते थे। भ्रष्टाचार रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के स्थान पर यह निर्णय बेरोजगारों  के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है। ईमानदारी के नाम पर बहुत से स्थानों पर ऐसे अधिकारी तैनात किए गए हैं। जो ईमानदार तो हैं, लेकिन अर्कमण्ड और अयोग्य हैं।

उत्तर प्रदेश 2017 विधानसभा चुनाव में जनता ने बीजेपी को भारी बहुमत से विजयी बनाकर एक नायाब तोहफा दिया है। सरकार को जनता की उस उम्मीद को किसी भी परिस्थिति में नहीं टूटने देना चाहिए। साथ ही प्रदेश की सभी रिक्तियों को अगले तीन से छह महीने के अंदर भरने की उच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। जिससे यह संदेशा जाए कि सरकार प्रदेश के विकास तथा नौजवानों के कल्याण हेतु संवेदनशील है। और वह प्रदेश को विकास के उच्च कीर्तिमान स्थापित ​करने के लिए कृतसंकल्प है।

sanjaymohan1951@gmail.com

नोट— यह लेखक के निजी विचार हैं, इसमें लिखी गई बातों से संस्थान का कोई संबंध नहीं है और ना ही संस्थान उत्तरदायी है।

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