यूपी: कहीं नीरव मोदी की तरह ‘कोठारी’ न लगा दें करोड़ों की चपत

  By : Team Khabare | February 18, 2018 3:02 pm

 

नई दिल्ली। बैंक को चूना लगाने का फैशन सा चल पड़ा है, जब कोई बड़ा कारोबारी बैंक से लिए हुए हजारो करोड़ रुपये को चुकता करने में पीछे रह जाता है तो उसे एनपीए की खुशामद मिलती है और यदि कोई किसान बैंक से लिए महज हजार या लाख रुपये चुकता नहीं कर पाता है तो उसे या कुर्की मिलती है या फिर शुदकुशी। खैर ये तो वो बातें है जिन्हें समझना जरूरी है लेकिन नया ताजा मामला यूपी के मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर से आ रहा है वो भी कम दिलचस्प नहीं है।

जी हां, एक तरफ देश का प्रर्वतन निदेशालय और सीबीआई नीरव मोदी को तलाशने में हांफ रही है वहीं दूसरी ओर एक और कारोबारी का नाम सामने आया है। जिसकी कहानी भी काफी हद तक नीरव मोदी जैसी ही है। बैंकों से हजारों करोड़ रुपये का कर्ज सिर पर है, कंपनी बंद हो चुकी है लेकिन नवाबी ठाठ में कोई कमी नहीं आयी है।

हम बात कर रहे हैं कानपुर के मशहूर व्यापारी विक्रम कोठारी की। विक्रम कोठारी पर आरोप है कि, उन्होनें अपने रोटोमैक पेंस नामक कंपनी के लिए अलग अलग बैंकों से तकरीबन 3,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया और आज तक उन कर्ज को चुकता नहीं किया है। वहीं जिस कंपनी के नाम पर कोठारी ने कर्ज लिया उस पेन कंपनी की स्याही भी सूख चुकी है और उस पर ताला लग चुका है।

किस बैंक से है कितना कर्ज:

विक्रम कोठारी ने अपने रोटोमैक पेंस के लिए अलग अलग बैंकों से करोड़ों रुपये का कर्ज लिया है, और दिलचस्प बात ये है कि, हजारों करोड़ रुपये का ये कर्ज और अभी तक कर्ज का भुगतान नहीं किया गया है। जानिए किस बैंक से कितना कर्ज लिया है कोठारी ने —

  • इलाहबाद बैंक से 375 करोड़ रुपये।
  • यूनियन बैंक से 432 करोड़ रुपये।
  • इंडियन ओवरसीज बैंक से 1400 करोड़ रुपये।
  • बैंक ऑफ इण्डिया से 1300 करोड़ रुपये।
  • बैंक ऑफ बड़ौदा से 600 करोड़ रुपये।

कैसे लिया इतना बड़ा कर्ज:

जहां एक अदने इंसान को कर्ज लेने के लिए फाइलों से लेकर सिफारिशों की लंबी दौड़ लगानी पड़ती है वहीं इन बड़े कारोबारियों को महज तगड़े सब्जबाग के आधार पर भारी कर्ज मिल जाता है। विक्रम कोठारी के इस मामले में भी कुछ ऐसी ही बातें सामने आयी है। सूत्रों द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार विक्रम कोठारी ने अपने बैंकों के कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते अपने जमीनों की कीमत ज्यादा से ज्यादा लगवायी और फिर उन्हें इनकी कीमत के आधार पर करोड़ों का कर्ज हासिल हुआ। वहीं इस मामले में ये भी बात सामने आयी है कि, विक्रम कोठारी के जमीनों की कीमत इतनी नहीं है कि, बैंको से लिए गये कर्ज को चुकता किया जा सके।

क्या कर रहे हैं बैंक:

आपको बता दें कि, बैंको से करोड़ों रूपये बतौर कर्ज लेने का सिलसिला सन 2012 से शुरू हुआ था जो कि लंबे समय तक चला। रोटोमैक पेंस को चलाने के नाम पर विक्रम कोठारी ने हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लिया और फिर उसे चुकता करने में नाकाम रहे। जब बैंकों की शाखाओं को इस बारे में जानकारी हुई तो इस कर्ज के बारे में उन्होनें अपने मुख्य कार्यालयों को जानकारी दी और इनके एकाउंट को एनपीए घोषित कर दिया।

क्या होता है (NPA) नॉन परफॉर्मिंग एसेट?

आपको एनपीए को समझना भी बेहद ही जरूरी है, आखिर ये एनपीए क्या होता है जिसका फायदा इन बड़े कारोबारियों को हो रहा है। गौरतलब हो कि, जब व्यक्ति किसी बैंक से कर्ज लेता है और वो अपने बैंक को ईएमआई देने में नाकाम रहता है, तब उसका लोन अकाउंट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) कहलाता है। जब किसी लोन की ईएमआई, प्रिंसिपल या इंटरेस्ट ड्यू डेट के 90 दिन के भीतर नहीं आती है तो उसे एनपीए में डाल दिया जाता है। इसे ऐसे भी लिया जा सकता है कि जब किसी लोन से बैंक को रिटर्न मिलना बंद हो जाता है तब वह उसके लिए एनपीए या बैड लोन हो जाता है।

आखिर बैंक क्यों हो रहे हैं फेल:

ऐसे में एक बड़ा सवाल ये पैदा हो रहा है कि, आखिर बैंक ​इतना बड़ा कर्ज देने के बाद फेल क्यों हो रहे है। जब बैंकों ने विक्रम कोठारी को कर्ज दिया तो उनकी पुख्ता जांच क्यों नहीं की गयी। क्या इसके पीछे किसी बड़े रसूख का इस्तेमाल किया गया या फिर बैंकों के कर्मचारियों की मिलीभगत से इतने बड़े मामले को अंजाम दिया गया। यदि समय रहते सरकार और बैंक कोई कड़ा कदम नहीं उठाते हैं तो नीरव मोदी की ही तरह उत्तर प्रदेश का ये व्यापारी भी बैंक को करोड़ों रुपये की चपत लगा सकता है।