संविधान के आइनें में ‘राज्यसभा’

  By : Rahul Tripathi | March 23, 2018 7:35 pm

राहुल त्रिपाठी 

हाल ही में उत्तर प्रदेश अपनी चुनावी सरगर्मियों को लेकर पूरे देश में राजनैतिक चर्चाओं के केन्द्र में रहा है। चाहे वह लोकसभा की दो सीटों में हुए उपचनाव रहा हो, जिसमें बसपा ने देश के चुनावी पण्डितों को चौकाते हुए समर्थन अपने धुर विरोधी समाजवादी पार्टी को दिया हो या फिर प्रदेश की खाली हुई 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव को लेकर राजनीतिक पार्टियों के बीच हो रही शह-मात का खेल रहा हो। ये सभी घटनाएं इस बात की तरफ इशारा कर रहीं हैं कि यह चुनाव राजनीतिक पार्टियों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से राज्यसभा की एक-एक सीटों को लेकर जिस प्रकार सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी सक्रिय है या यूं कहें की जोड़ तोड़ कर रही है। उससे इस चुनाव की गंभीरता को तथा उसके महत्व को लेकर कोई शुभह नहीं रह जाती है।

लोकसभा में प्रचंड़ बहुमत से पहुंची बीजेपी जिस प्रकार से विधेयकों को राज्यसभा में पास कराने में विवश नजर आयी। तभी यह निश्चित हो गया कि उसकी ऐतिहासिक विजय कितनी गौड़ है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि बिना राज्यसभा में बहुमत के बिना उनकी यह विजय अधूरी है। लोकसभा में विशाल बहुमत से पहुंची बीजेपी राज्यसभा में हमेशा हासिए पर नजर आई। ट्रिपल-तलाक जैसे कई महत्वपूर्ण बिल आज भी राज्यसभा में लटके पड़े हैं। ये सभी बातें राज्यसभा की संसद में एक विशेष स्थिति की ओर इशारा करती हैं। राज्यसभा की कानून निमार्ण में क्या भूमिका है इसको सही ठंग से समझने के लिए हमें संविधान में इसकी स्थिति को समझना होगा।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 में कहा गया है कि राज्यसभा का गठन 250 सदस्यों से होगा। जिनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किया जाता है जो कला, साहित्य, विज्ञान तथा समाजसेवा के क्षेत्र के ख्याति प्राप्त व्यक्ति होते हैं। शेष 238 को राज्य तथा संघ राज्य क्षेत्रों से अप्रत्यक्ष मतदान की एकल संक्रमणीय पद्धति प्रक्रिया द्वारा चुना जाता है। जिसमें राज्य के विधान मण्डल के चुने हुए प्रतिनिधि भाग लेते हैं। संविधान की अनुसूची चौथी में राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों के राज्यसभा सीटों का आवंटन किया गया है। इन सीटों के निर्धारण के लिए राज्य की जनसंख्या को आधार माना गया है।

राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 1952 से अब तक बदलती रही है। वर्तमान में राज्यसभा की कुल सदस्या संख्या 245 है। जिसमें से 12 राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत तथा शेष निर्वाचित हैं। भारतीय संसदीय व्यवस्था में राज्यसभा की उत्पत्ति आजादी से पहले की है। जिसका प्रारम्भ 1918 में मोण्टेग-चेम्सफोर्ड की सिफारिसों के आधार पर, 1919 में भारत सरकार अधिनियम में हुआ था। इसको भारतीय विधान मण्डल में कांउसिल ऑफ स्टेट के नाम से शामिल किया गया। स्वतंत्रता के पश्चात कांउसिल ऑफ स्टेट को विस्तृत विचार विमर्श के बाद भारतीय संसदीय व्यवस्था में द्वितीय सदन के रूप में शामिल कर लिया गया।

स्वतंत्रता के पश्चात निर्माताओं के समक्ष भारत जैसे विविधता वाले देश के लिए एक शासन व्यवस्था बनाने की बहुत बड़ी चुनौती थी। संविधान निर्माताओं में देश की संसदीय व्यवस्था के निर्माण को लेकर भी मतभेद थे। विशालता और विविधता से परिपूर्ण देश में सभी का विकास तथा प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए द्विसदनी संसदीय व्यवस्था को अपनाने का निर्णय लिया गया। साथ ही यह व्यवस्था भारत की लोकतांत्रिक चरित्र को अछुण रखने में भी सहायक होगी। इससे कोई भी सदन अत्याधिक शक्तिशाली होकर निरंकुश नहीं हो सकेगा।

स्वतंत्र भारत के संसदीय व्यवस्था में संघ और राज्यों के बीच बराबरी की सहभागिता को सुनिश्चित करने के लिए राज्यसभा का गठन 3 अप्रैल 1952 को किया गया और इसकी पहली बैठक 23 अगस्त 1952 को बुलाई गयी। 26 अगस्त सन 1954 को इसका नाम कांउसिल ऑफ स्टेट से बदल कर राज्यसभा किया गया। राज्यसभा के पहले सभापति डॉ. एस राधाकृष्णन थे। राज्यसभा, लोकसभा द्वारा पारित विधेयकों का पुनर्निरीक्षण करता है और इसके पास करने के बाद ही विधेयक राष्ट्रपति की संसृती को लिए भेजा जाता है।

भारतीय संसद के तीन अंग है, लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति। कोई भी विधेयक तबतक कानून नहीं बन सकता जबतक की वह संसद के तीनों अंग से स्वीकृति नहीं प्राप्त कर लेता। कुछ परिस्थितियों में तो राज्यसभा लोकसभा से अधिक शक्तिशाली हो जाती है।
जैसे संविधान के अनुच्छेद 249 के अन्तर्गत राज्यसभा अपने विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास करके राज्य सूची में वर्णित किसी भी विषय पर कानून बना सकती है। अनुच्छेद 312 के अनुसार राज्यसभा 2/3 बहुमत से पास विधेयक द्वारा अखिल भारतीय स्तर के किसी भी पद का सृजन कर सकती है।

राज्यसभा एक स्थाई सदन है, जो अपनी स्थापना से आज तक कभी भी भंग नहीं हुआ है। देश में आपातकाल की स्थिति में जब लोकसभा भंग हो जाती है उस समय कानून बनाने का काम राज्यसभा द्वारा ही किया जाता है। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष के लिए होता है। लेकिन इस प्रकार की व्यवस्था की गयी है कि इसके 1/3 सदस्य हर दो साल में कार्यमुक्त हो जाते हैं। अर्थात हर दूसरे साल राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव होता है। संविधान में राज्यसभा को धन विधेयक को छोड़कर सभी मसले पर लोकसभा के बराबर अधिकार प्राप्त है। कोई भी विधेयक को कानून बनाने के लिए राज्यसभा की स्वीकृति आवश्यक है। शायद इसीलिए बीजेपी राज्यसभा में बहुमत प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास कर रही है।

 

 

राज्य                      राज्यसभा सीट

  • आंध्र प्रदेश                11
  • अरुणाचल प्रदेश        1
  • असम                       7
  • बिहार                      16
  • छत्तीसगढ़                  5
  • गोवा                        1
  • गुजरात                     11
  • हरियाणा                  5
  • हिमाचल प्रदेश          3
  • जम्मू और कश्मीर       4
  • झारखंड                   6
  • कर्णाटक                  12
  • केरल                       9
  • मध्य प्रदेश               11
  • महाराष्ट्र                   19
  • मणिपुर                    1
  • मेघालय                   1
  • मिजोरम                   1
  • नागालैंड                   1
  • दिल्ली                     3
  • उड़ीसा                     10
  • पुडुचेरी                     1
  • पंजाब                      7
  • राजस्थान                  10
  • सिक्किम                  1
  • तमिलनाडु               18
  • तेलंगाना                   7
  • त्रिपुरा                      1
  • उत्तरांचल                 3
  • उत्तर प्रदेश               31
  • पश्चिम बंगाल           16