आज ही के दिन दहला था ‘गुजरात’, चली गई थी हजारों की जान

  By : Team Khabare | January 26, 2018 4:48 pm

अश्विनी ‘सत्यदेव’

नई दिल्ली। आज ही के दिन 17 साल पहले, हर रोज की तरह बादलों को चीरते हुए सूरज की रोशनी कोहरों के बीच से धरा को रौशन कर रही थी। एक बोझिल रात समाप्त हो चुकी थी और गणतंत्र दिवस के मौके पर स्कूली बच्चों की टोली उछलते कूदते स्कूलों की तरफ कूच कर रही थी। हमने इन स्कूली बच्चों का जिक्र इसीलिए किया क्योंकि वो दिन आज भी मेरे जेहन में जिंदा है। मैं भी उस वक्त नौवीं दर्जे में पढ़ता था, मैं भी पूरे जोश के साथ स्कूल के लिए निकला था। स्कूल में इस मौके पर बहुत सारे कार्यक्रम होने थें, लेकिन इन सब से दूर देश के पश्चिम में ये सूबह किसी काली रात की तरह उदय होने वाली थी और एक ही झटके हजारों की बलि के लिए लालायित थी।

ये वाक्या 26 जनवरी सन 2001 का है, हम सभी स्कूल पहुंच चुके थें। स्कूल प्रबंधन के अनुसार आठवीं तक के बच्चों को स्कूल के नीचे मैदान में पंक्ति में खड़ा होना था और नौवीं और दसवीं के बच्चों को स्कूल की छत पर खड़े होकर झंडारोहण में हिस्सा लेना था। कार्यक्रम शुरू हो चुका था, पूरे जोश के साथ राष्ट्रगान के बाद झंडारोहण हो चुका था। हम सभी छत पर खड़े थें और हमारे साथ में हमारे गणित के अध्यापक राम सिंह जो कि लंबी कद काठी के थें। कार्यक्रम चल रहा था अचानक एक हल्का सा कंपन महसूस हुआ, ये अनुभव ​जीवन में पहली बार था।

मुझे लगा देर तक खड़े रहने की वजह से चक्कर आ रहा है। क्योंकि पहले ही हमें अध्यापकों द्वारा बताया गया था कि, यदि किसी को भी देर तक खड़े रहने के कारण चक्कर आये तो वो अपनी जगह पर बैठ सकता है और शिक्षक को तत्काल सूचित करेगा। मैं अभी सोच ही रहा था कि, तभी राम सिंह ने तत्काल सभी बच्चों को अपनी जगह पर बैठने के लिए कहा। इससे पहले कि, कोई कुछ समझ पाता सभी लोग राम सिंह की उस चीख के जवाब में छत पर ही बैठ गए।

हम लोगों में से किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि, आखिर क्या हुआ है जो हमारे टीचर ने हमें बैठने के लिए कहा है। तकरीबन 5 मिनट बाद राम सिंह ने सीढ़ियों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि, सभी बच्चे बड़े ही आराम से नीचे की तरफ उतरें। हम लोग नीचे उतर गयें और फिर थोड़ी देर में कार्यक्रम समाप्त हो गया। हम सभी बच्चे अपने हाथों में स्कूल से मिलने वाले लड्डू को लेकर घर की तरफ भाग निकलें। उस वक्त मेरे दिमाग में एक ही बात चल रही थी कि, स्कूल की छत पर आखिर क्या हुआ था।

जब मैं घर पहुंचा तो सब कुछ सामान्य था लेकिन टीवी पर जो दृश्य दिख रहा था वो आज भी दिमान को सुन्न कर देता है। उम्र कम थी लेकिन खुशी, गम, दर्द और तकलीफ को समझने के लिए काफी थी। टीवी पर लाल पट्टियों पर धड़ाधड़ ब्रेकिंग चल रही थी, घर के सभी सदस्य टीवी को घेर कर बैठे थें। मैने मां से पूछा क्या हुआ है, तो उसने टीवी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि, गुजरात में बहुत बड़ा भूकंप आया है। मां के एक छोटे से वाक्य ने मेरे स्कूल के छत के उस सवाल का पूरा और सटीक जवाब दे दिया था। हजारो किलोमीटर दूर गुजरात के उस झटके को मैनें अपने इन्हीं पैरों में कुछ देर पहले महसूस किया था। खैर ये तो हुई गोरखपुर की बात, अब आपको बताते हैं गुजरात के उस विनाशकारी भूकंप के बारे में —

गुजरात का भुज आज ही के दिन सुबह तकरीबन 8 बजकर 46 मिनट पर 7.7 मैग्निट्यूड के भूकंप के झटके से बिखर चुका था। महज एक ही पल में इस विभत्सकारी प्राकृतिक आपदा ने लाखों लोगों की आखों में कभी न रुकने वाला आंसू दे दिया था। इस हादसे में भुज शहर की बड़ी से बड़ी इमारतें ताश के पत्तों की मानिंद जमींदोज हो चुकी थी। सरकारी तंत्र और अमला भी खुदा के इस कहर के आगे बेबस था, हर तरफ धूल का आसमान छूता गुबार और उनमें छिपी चीखें पूरे गुजरात के दिल को चीर रही थीं।

देश के सबसे बड़े भूकंप की विनाश लीला:

अब तक देश की धरती कभी भी इतनी तेजी से नहीं कांपी थी। समुद्र तल से 110 मीटर उंचाई पर बसे इस शहर में भूकंप ने एक ही झटके में विनाश का जो तांडव किया था उसमें तकरीबन 20 हजार लोगों की मौत हुई थी, वहीं 1 लाख 67 हजार लोग घायल हुए और 4 लाख से ज्यादा घर जमींदोज हो गए थें। इस विनाशलीला में केवल भुज ही नहीं बल्कि कच्छ, अंजर और बचाउ इलाके के लगभग 8 हजार गांव बुरी तरह से प्रभावित हुए थें। इतना ही नहीं, एक रिपोर्ट के अनुसार 182 तालुकों के लगभग 6 लाख लोग बेघर हो गए थे।

इस भूकंप ने गुजरात के प्रमुख शहर अहमदाबाद में भी विनाश की बानगी लिखी, उस वक्त लगभग 64 लाख आबादी वाले इस शहर में 50 बहुमंजली इमारत धराशायी हो गयी थी। इस हादसे में लगभग 75 हजार लाख रुपये की संपति खाक हुई थी।
स्कूल में परेड में मिली मौत की सौगात:

उस वक्त अंजर के खत्री चौक पर एक स्कूल में गणतंत्र दिवस के मौके पर परेड किया जा रहा था, जब भूकंप आया तो इस स्कूल में सैकडो लेाग थें। इस परेड के दौरान अचानक से आये इस भूकंप ने स्कूल के दोनों बिल्डिंगों की नींव को ऐसा झकझोरा कि दोनों बिल्डिंग एक ही झटके में जमींदोज हो गई। इस हादसे में कितनों को चीखने तक का मौका नहीं मिला था और एक ही झटके में स्कूल के बच्चों और अध्यापकों सहित 143 लोगों की जान चली गई थी।

भूकंप के बाद हर तरफ उजड़ा शहर था, कच्छ और बचाउ का तो नामोनिशां ही मिट गया था वहीं अंजर के कई गांव सपाट मैदान में तब्दील हो गये थें। जिधर देखो केवल मौत का तांडव और मासूमों की चीख थी। इस हादसे के कई दिनों बाद तक इमारतों के मलबों से लाशें निकाली जाती रही। नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स की टीमों ने भी आज तक मौत का ऐसा नंगा नाच नहीं देखा था।

जिस मलबे की तरफ वहीं उन्हें लाशे दिखती थी। कहीं कहीं, मलबों में कुछ लोग जिदंगी से जुझ भी रहे थें, उन्हें बड़ी ही मुश्किल से बाहर निकाला जाता था। इस हादसे में जिन्हें मौत मिली उनके परिजनों का रो रो कर बुरा हाल था, और कई लोग ऐसे भी थें ​जो जिंदा रहते हुए भी जिंदगी भर मौत जैसा दर्द महसूस करने को मजबूर हो गये थें, किसी ने अपने पैर खो दिये तो किसी ने हाथ। हंसती खेलती जिंदगी एक पल में मौत का वो काला कुआं हो गई थी, जिसमें महज करतब करना था बाहर आने का कोई रास्ता नहीं था।

मदद:

इस हादसे के बाद दुनिया भर के देशों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया था। जिनमें अमेरिका, आस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, बेल्जियम, कनाडा, चीन, ग्रीस, इजरायल, इटली, कुवैत, न्यूजीलैंड, नीदरलैंड, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, सिरिया, ताइवान, ब्रिटेन, और अरब प्रमुख देश थें। पाकिस्ता ने मदद के तौर पर 13 टन खाद्ध सामाग्री, ब्लैंकेट और राहत सामाग्री भेजी थी। इस भूकंप का झटका पाकिस्तान में भी महसूस किया गया था वहां पर भी 18 लोगों की मौत हुई थी। वहीं अमेरिका ने 50 लाख डॉलर के मुल्य की राहत सामाग्री भेजी थी।