देशभक्ति को धर्म के चश्मे से देखने वालों को ये जरूर पढ़ना चाहिए

  By : Team Khabare | February 13, 2018

अश्विनी ‘सत्यदेव’

नई दिल्ली। हमारे लिए देश पहले है, धर्म, जाति और परिवार उसके बाद आते हैं। ये कथन किसी आम इंसान के नहीं बल्कि एक सैनिक की जुबान है। जब ये जवान भारतीय सेना का हिस्सा बनते हैं तो उसके बाद उनके जेहन में न तो धर्म होता है, न जाति और न ही कौम। वो सीमा पर खड़े होकर बस तिरंगे की हिफाजत की कसम खाते है। लेकिन सीमा के भीतर उन्हीं जवानों को उनकी बटालियन, का​बलियत और संघर्ष के अलांवा उनकी जाति, धर्म और मजहब से जाना जाता है।

ये कोई कसूर नहीं है कि वो किस मजहब में पैदा हुए, चाहे वो हिंदू हो या फिर मुसलमान। सीमा पर खड़ा सिपाही हर सुबह मंदिर की घंटी और मस्जिद की अजान के बजाय बटालियन के बिगुल पर जागता है। लेकिन हमारे यहां घर के भीतर मस्जिद की अजान और मंदिर की घंटी दोनों पर ही सवाल खड़े किये जाते है।

खैर, आपको याद दिला दें कि, बीते दिनों जम्मू के सुंजवां आर्मी कैंप में आतंकियों ने हमला किया था, जिसके बाद भारतीय सेना ने आॅपरेशन के तहत 4 आतंकियों को ढ़ेर कर दिया। वहीं इस हमले में भारतीय सेना के 6 जवान शहीद हो गयें और 11 गंभीर रुप से घायल हो गयें। इसके अलावा इस हमले में एक जवान के पिता की भी मौत हो गयी।

कौन थें ये लोग जिन्होनें अपनी प्राणों की आहुति दी:

हम यहां आरामदेह कमरों में सोफे पर बैठकर देश, विदेश, पाकिस्तान, सेना, क्रिकेट, फिल्म और न जाने कितने विषयों पर अपनी टिप्पणी देते रहते है। कुछ लोग तो ऐसे भी है जो अपने आस पास एक खास समुदाय के लोगों को ही शक की नजर से देखते है। ये मानते हैं कि, आतंक फैलाने वाले सभी एक खास मजहब से आते हैं, लेकिन क्या इसका ये मतलब है कि हम अपने घर में ही उस खास मजहब के सभी लोगों को आतंकी मान लें।

इस हमले में जो 6 जवान शहीद हुए उनमें से 4 इसी खास मजहब से आते है। उन आतंकियों के सामने इन लोगों ने अपने मजहब या फिर कौम को नहीं देखा। उस वक्त इनकी रगों में जो खून दौड़ रहा था, वो हिंदुस्तानी था। सांसों में जो धौंक जल रही थी वो आर्यवर्त की थी। गले में जो हुंकार थी वो भारत माता की जय थी, और सिर से जो पसीना बह रहा था वो गंगा थी।

लेकिन हम उसी मजहब के लोगों को आतंक की चादर में लपेट के पुछते हैं कि, बता तेरा मुल्क कौन सा है, बता तेरी कौम क्या है। धर्म कभी किसी को पाबंद नहीं करता है, वो बेड़ियां नहीं डालता है। लेकिन आज के समय में चंद सियासतदानों ने धर्म और कौम के नाम पर नफरत का ऐसा ड्रग हमारी रगों में भर दिया है जिससे बाहर निकल हम कुछ देख ही नहीं पाते है।

सुंजवां हमले में शहीद होने वाले —

1. मोहम्मद अशरफ मीर, सुबेदार

2. हबीब उल्लाह कुरैशी, हवलदार

3. मोहम्मद इकबाल शेख, लांस नायक

4. मंजूर अहमद देवा, लांस नायक

5. मदन लाल चौधरी, सुबेदार

6. राकेश चंद्र, हवलदार

7. मोहम्मद शेख, इकबाल शेख के पिता

वो एक खास कौम पाकिस्तान बाद में गया, पहले उन्होनें हमारे साथ खड़े होकर अंग्रेजों का मुकाबला किया। हम आजाद हुए और उस वक्त की सियासत ने मुल्क के सीने पर तक्सीमियत की एक लकीर खींची जो आज नासूर बन गयी। बाहर के दुश्मनों से लड़ना आसान है लेकिन भीतर के दुश्मनों से पार पाना बेहद मुश्किल है।

हम सभी के जेहन में एक दुश्मन छिपा है, जिसका नाम ‘नफरत’ है। उस दुश्मन को खत्म करिये, और वास्तविकता की धरातल पर आइये। खबरों का सब्जबाग और सनसनी सिर्फ आपके भीतर एक जहर पैदा करेगा। मुल्क के हालात से आप खुद परिचित होइये, यूं दुश्मनी का जहर घर में मत घोलिए।

धर्म पर गर्व भले हो लेकिन कौम गलत नहीं:

आप सभी कुछ पल के लिए बचपन में लौट जाइये, और याद करिये कि, क्या बचपन में आपका कोई मुसलमान या फिर हिंदू दोस्त नहीं था। लेकिन वक्त के साथ हालात बदलें और उन्होनें हमारी सोच ही बदल कर रख दी। किसी को भी अपने मजहब पर गर्व करना गलत नहीं लेकिन दूसरे के धर्म, कौम पर सवाल खड़े करने का अधिकार किसी को नहीं है।

अब्दुल हमीद, ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, ए पी जे अब्दुल कलाम, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, सर सैयद, सिप्ला के चेयरमैन युसूफ ख्वाजा हमीद, डा. जाकिर हुसैन, उस्ताद बिसमिल्लाह खान, ए आर रहमान, मोहम्मद रफी, जावेद अख्तर, कैफी आजमी और न जाने कितने नाम है जिन्होनें अपने अपने क्षेत्रों में सबसे उत्कृष्ठ कार्य किये है। क्या इन सब के बिना एक बेहतर भारत का निर्माण हो सकता था।

जाति, धर्म महज वोट बैंक:

आखिर किसके बरगलाने पर कौमें शम्शीरें खिंचती है। ये कुछ मौकापरस्त सियासतदान है, जिनका एकमात्र मकसद कुर्सी है वो ही समाज में इस तरह की बातें फैलाते है और आज नौजवान पिढ़ी किसी भेड़ की तरह उनके पीछे हो लेती है। ये वही नौजवान है जो अपने घर में मां बाप की बातों का एक हर्फ भी नहीं मानते है और किसी नेता के भड़काउ भाषण पर अमल करते है।

अयोध्या में राम लला के कपड़े से लेकर मंदिर की बिजली व्यवस्था और अन्य इंतजाम मुस्लिम ही देखते है। योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर के मशहूर गोरखनाथ मंदिर में मुसलमानों की ही दुकाने हैं जो प्रसाद से लेकर हर जरूरतों को पूरी करते है। फिर ये टोपी और तिलक के बीच शक और नफरत की दीवार क्यों।

खुद विचार कीजिए, ये दोनों धर्म और कौमों के हित के लिए जरूरी है।