फ्रांस के साथ भारत की बढ़ती सामरिक भागीदारी

  By : Rahul Tripathi | March 13, 2018

राहुल त्रिपाठी

विश्व राजनीति की भागीदारी में भारत और फ्रांस की साझेदारी लगभग 20 सालों की है। लेकिन भारत और फ्रांस के सम्बंधों का इतिहास काफी पुराना है। औपनिवेशिक काल में एक व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्क के रूप में इस संबंध का प्रारम्भ हुआ और जो समय के कालक्रम में बढ़ते बढ़ते आज राजनीतिक-सामरिक भागेदारी तक आ पहुंची। समय की कसौटी ने इस मित्रता को और अधिक मजबूत किया। विशेष रूप से जब भारत ने 1999 में परमाणु परीक्षण किया तो फ्रांस ने इसको भारत की आवश्यकता बताकर हमारा साथ दिया तथा अमेरिका द्वारा लगाए गये आर्थिक प्रतिबन्धों से अलग रह कर हमारा समर्थन किया।

फ्रांस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत की चार दिवसीय यात्रा पर आए हुए हैं तो स्वाभाविक हैं कि दोनों देशों के सम्बंधों में और प्रगाढ़ता आयेगी। हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ समय पहले ही फ्रांस की यात्रा में गये थे। उस समय सरकारी स्तर पर 36 रॉफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का समझौता हुआ था। फ्रांसीसी राष्ट्रपति 11 मार्च को अन्तराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के उद्घाटन सत्र में शामिल हुए। आईएसए को लेकर इस भारतीय पहल का प्रारम्भ पेरिस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान हुआ था। इसके साथ ही साथ इसी 11 तारीख को ही भारत औऱ फ्रांस के बीच सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा और गोपनीय सूचनाओं के संरक्षण जैसे 14 अहम रणनीतिक मसलों के समझौतों पर हस्ताक्षर किया गया। जिसमें शिक्षा, पर्यावरण, शहरी विकास, रेलवे, आतंकवाद और धार्मिक कट्टरता जैसे मुद्दों प्रमुख हैं।

गौरतलब हो कि भारत फ्रांस के बीच का यह समझौता 16 बिलियन डॉलर का है। इस समझौते का सबसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा सैन्य तथा ऊर्जा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच बनी सहमति है। ऊर्जा में जहां फ्रांस भारत में विशेष रूप से परमाणु तथा सोलर एनर्जी में निवेश कर रहा है, जो लगभग 9.6 गीगा वॉट का है। महाराष्ट्र के जैतपुर में फ्रांस की मदद से एशिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा केन्द्र बनाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में 75 मेगावाट क्षमता का सोलर प्लांट का निर्माण फ्रांस द्वारा किया जा रहा है। इसका उद्घाटन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने किया है। इस प्रोजेक्ट में 500 करोड़ रुपये का फ्रांसीसी निवेश हुआ है, यह प्रदेश का सबसे बड़ा सोलर प्रोजेक्ट है।

वहीं सामरिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं जिसका की आने वाले समय में विश्व राजनीति पर महती भूमिका होगी और जो भारत फ्रांस की मैत्रीपूर्ण संबंधों की गवाह बनेगी। इस सैनिक साझेदारी की प्रमुख बातें हैं, एक दूसरे के बीच नौसैनिक भागीदारी तथा समुद्र में मुक्त आवाजाही है। इस समझौते के अन्तर्गत- फ्रांस के नौसैनिक पोत भारत के बन्दरगाहों का इस्तेमाल तथा मरम्मत करा सकेंगे। साथ ही हिन्द महासागर में स्थित फ्रांस के सैन्य बेसों का भी इस्तेमाल भारतीय नौसैनिक जहाज कर सकेंगे। फ्रांस के आबूधावी, रियूनियन तथा जिबूती सैनिक बेसों की सुविधाओं का भारतीय युद्ध पोत लाभ ले सकेंगे।

भारत फ्रांस के बीच इन सैन्य समझौतों का उद्देश्य एक तो दोनों देशों की सेनाओं के बीच परस्पर आपसी सहयोग बढ़ाना तथा हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र में चीन की बढ़ती हुई सक्रियता, विस्तारवाद तथा आक्रमकता पर रोक लगाना है। साथ ही समुद्रों के सामूहिक अधिकार को सुरक्षित रखते हुए समुद्री यातायात को सभी के लिए सुगम बनाना है तथा चीन एकाधिकारवाद पर अंकुश लगाना है। क्योंकि भारत फ्रांस का मानना है कि समुद्र में किसी भी मुल्क को सैन्य जमावड़ा जमाने का अधिकार नहीं है। सभी देशों को मुक्त व्यापार और आवाजाही का अधिकार है।
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में हिन्द महासागर तथा दक्षिणी चीन सागर में चीन ने अपनी नौसैनिक क्षमताओं का विकास कर अपने कई नौसैनिक अड्डे बना लिए हैं।

विशेष रूप से हिन्द महासागर में ग्वादर (पाकिस्तान), हम्बनटोटा (श्रीलंका) तथा मालदीव में अपने इन्हीं नौसैनिक बेस द्वारा चीन ने अपनी चुनौती पेश की। इतना ही नहीं श्रीलंका तथा मालदीव में हुए राजनीतिक हलचल जिससे यहां पर आपातकाल लागू हो गया। इसमें भी चीन का हाथ होने का पूरा पूरा अंदेशा है जिससे वह इन देशों से भारत का प्रभाव समाप्त कर सकें। भारत और फ्रांस दोनों देशों की नौसेना मिलकर साझा चुनौती पेश कर चीन के इरादे पर लगाम लगा सकते हैं।