चीनी कर्ज के शिकंजे में फंसते छोटे देश

  By : Rahul Tripathi | March 21, 2018 1:50 pm

राहुल त्रिपाठी

चीन आज विश्व की बहुत बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन गया है। इस समय यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है, जिसकी कुल 23 ट्रलिएन डॉलर की परिसम्पत्ति है। करीब 30 चीनी कम्पनियां ऐसी हैं जो विश्व फार्चून की लिस्ट में शामिल हैं। चीन की आर्थिक समृद्धि उसको आर्थिक साम्राज्यवाद की ओर ले जा रहा है। अपनी आर्थिक समृद्धि के बल पर चीन छोटे देशों को सस्ते लोन के दु:चक्र में फंसाकर उनकी जमीनों को हड़प रहा है। अर्थात चीन आज अपनी आर्थिक समृद्धि को आर्थिक औपनिवेश बढ़ने के साधन के रूप में कर रहा है। पहले इन देशों के विकास के लिए निर्माण का प्रोजेक्ट हासिल करता है और इसके लिए सस्ते लोन का झांसा देता है। फिर लोन ना चुका पाने की स्थित में उसके क्षेत्र को 99 साल के पट्टे पर ले लेता है।

इसको इस प्रकार से भी समझा जा सकता है, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं जो विकास के लिए देशों को लोन देती हैं जैसे IMF तथा विश्व बैंक। ये संस्थाएं लोन देने से पहले यह निश्चित करती हैं कि जिस प्रोजेक्ट के लिए लोन लिया जा रहा है उसकी लागत क्या है, उससे कितनी इंकम होगी तथा क्या उस देश की अर्थव्यवस्था लोन चुकाने में सक्षम है। राजनीतिक रूप से मजबूत और स्थिर शासन व्यवस्था है। इन सभी तथ्यों पर ध्यान देने के बाद ही वह कोई लोन पास करती है। लेकिन चीन यह देखता है कि देश की सामरिक स्थित कितनी महत्वपूर्ण है और भविष्य में वह उसके लिए कितना फादेमंद होगा। इसी आधार पर बड़े विनिर्माण प्रोजेक्ट को हासिल करने का प्रयास करता है।

इस समय कई देशों में चीन के बड़े निवेश वाले विनिर्माण प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जैसे कम्बोडिया, नाइजीरिया, श्रीलंका तथा पाकिस्तान। चीनी लोन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका निवेश ऐसे देशों में हो रहा है जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं और जिनपर वह अपनी आर्थिक तथा सैन्य शक्ति का धौंस दिखाकर भविष्य में अपनी जरूरत के हिसाब से शर्तों को तय कर सके। जिससे वह अपने सामरिक हितों को साध सके। चीन के सस्ते लोन की दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी अस्पष्ट शर्तें हैं। जिसमें गरीब देश बहुत आसानी से फंस जाते हैं।

चीन की कम्पनी प्रोजेक्ट को हासिल करने के लिए कितने आक्रामक हैं, इसका एक मजेदार वाक्या 2009 में देखने को मिला। दरअसल, पोलैण्ड में सड़क निर्माण की एक बड़ी प्रोजेक्ट को हासिल करने के लिए चीन की कम्पनी चाइना ओवरसीज इंजीनियरिंग क्रॉप ने 50% कम लागत में कांट्रेक्ट ले लिया। लेकिन बाद में जब उसकी लागत बढ़ने लगी तब उसको वहां से हटना पड़ा। कहने का अर्थ यह है कि चीन को बढ़चढ़ कर बातें करने की आदत है, उसको लगता की वह दुनिया का सबसे क्षमतावान देश हैं और इसके लिए वह कभी कभी धौंस का भी सहारा लेता है।

श्रीलंका के दक्षिणी समुद्र तट में स्थित हम्बनटोटा बन्दरगाह के विकास के लिए तथा उसे एयरपोर्ट और हाइबे से जोड़ने के लिए चीन ने एक बेहद खर्चीली एवं बड़ा विनिर्माण प्रोजेक्ट 2008-10 में प्रारम्भ किया। यह प्रोजेक्ट तत्कालीन राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपक्षे के शासनकाल में प्रारम्भ किया गया। जो सिंघली राष्ट्रवाद के प्रतीक माने जाते हैं। साथ ही चीन से घनिष्ट संबंधों के हिमायती रहे हैं। चीन ने श्रीलंका को सस्ते लोन का झांसा देकर करीब 8 अरब डॉलर की एक बड़ी राशि का निवेश इस प्रोजेक्ट में किया।

प्रारम्भ में श्रीलंका का ऐसा आंकलन था कि इस बंदरगाह के विकास के बाद बहुत बड़ी संख्या में विदेशी जहाज आएगें और इससे उसे काफी आय होगी। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। इस बंदरगाह की आय सीमित है। अत: इस भारी भरकम लोन को चुकाना श्रीलंका के लिए नामुमकिन हो गया। ऐसी स्थित में इस बंदरगाह का 80% हिस्सेदारी 99 साल के लिए 1.12 अरब डॉलर के बदले में चीन को दे दिया गया और शेष बची राशि को किस्तों में चुकाने का वादा किया गया। साथ ही इसका संपूर्ण नियंत्रण एवं प्रबन्धन चीन को सौप दिया गया।

वास्तव में चीन का उद्देश्य ही यही था, इसी लिए कुचक्र द्वारा एक बड़ी राशि का इस प्रोजेक्ट में निवेश किया गया। जिसको चुकाना श्रीलंका के लिए मुमकिन नहीं था और इसके बदले में उसे हम्बनटोटा का पूर्ण नियंत्रण मिल गया। देखा जाय तो यह चीन के Pulse of ring की पोलिसी का हिस्सा है। यह बंदरगाह की स्थिति सामरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। यह भारत के नैसैनिक बेस के नजदीक है साथ ही श्रीहरिकोटा जैसा संस्थान भी यहां से मात्र 500 किमी की दूरी पर स्थित है। जब 2012 में यहां चीनी पनडुब्बी देखी गयी तो भारत की अशंका सच होती प्रतीत हुई।

अत: यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गयी। इसलिए भारत ने इस प्रोजेक्ट का विरोध किया। साथ ही श्रीलंका के निवासियों में भी चीन की सक्रियता से भय उत्पन्न हुआ और इसका वाजिब कारण भी था। 2012 तक लगभग 10000 से 16000 चीनी नागरिक हम्बनटोटा के क्षेत्रों में बसाए गये। अत: श्रीलंका के आम नागरिकों ने इसका विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। भारत सरकार ने भी श्रीलंका सरकार के समक्ष अपनी बढ़ती हुई सुरक्षा चिन्ताओं को लेकर आगाह किया।

इसी समय 2015 में श्रीलंका में चीन से समर्थक राष्ट्रपति के स्थान पर मैत्रीपाला सिरीसेना की नई सरकार शासन में आई। अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार श्रीलंका इस प्रोजेक्ट को लेकर समझौते से हट नहीं सकता था। अत: इस सरकार ने भारत तथा अपने नागरिकों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए चीन से हम्बनटोटा बंदरगाह को लेकर नया समझौता किया।

नये समझौते के अनुसार अब चीन की हम्बनटोटा बंदरगाह पर हिस्सेदारी 80% के स्थान पर 70% कर दिया गया। बंदरगाह की सुरक्षा का सम्पूर्ण अधिकार अब श्रीलंका सरकार का हो गया। श्रीलंका सरकार की अनुम​ति के बिना चीन के भी नौसैनिक जहाज नहीं आ सकते। चीन को यहां केवल आर्थिक गतिविधियों की ही इजाजत है। 2017 में एक बार फिर चीन पनडुब्बी दिखने के बाद यह प्रश्न उठता है कि श्रीलंका इसको रोक पाने में कहां तक सक्षम रहता है।

इसी प्रकार हिन्द महासागर स्थित मालदीव में भी चीनी सस्ते लोन की सक्रियता देखने को मिली। जहां चीन ने निवेश के आड़ में बहुत ही चतुराई से बंदरगाह तथा एयरपोर्ट विकसित कर अपना नौसैनिक अड्‍डा विकसित कर रहा है। मालदीव से भारत का प्रभाव कम करने के लिए चीन ने यहां पैसा पानी की तरह बहाया। वर्तमान राष्ट्रपति यामीन अब्दुल गयूम चीनी प्रोत्साहन पाकर सम्पूर्ण विपक्ष को कैद करके आपातकाल लागू कर देश की सत्ता पर संपूर्ण अधिकार कर लिया है।

आज मालदीव चीन के नियंत्रण में पूरी तरह से जकड़ा हुआ है। मालदीव की सरकार ने भारत द्वारा चलाए जा रहे मिलन नौसैनिक अभ्यास पर चीन के उकसाने पर शामिल होने से साफ मनाकर दिया है। अर्थात मालदीव चीन की कठपुतली बन भारत को घेरने का एक औजार बन गया है।

चीन की आर्थिक साम्राज्यवाद का अगला मोहरा पाकिस्तान है। जहां चीन वन रोड़ वन बेल्ट सिद्धांत के द्वारा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा नाम का एक प्रोजेक्ट चला रहा है। जिसके अंतर्गत पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन के उत्तरी-पश्चिमी स्वायत्त क्षेत्र शिंजियांग को जोड़ते हुए सड़क, रेल तथा गैस पाइप लाइन बिछाने का प्रोजेक्ट प्रारम्भ किया गया है। यह करीब 50 अरब डॉलर का एक बहुत बड़ा विनिर्माण प्रोजेक्ट है।

ऐसा नहीं है कि यह चीन पाकिस्तान को सहायता के रूप में कर रहा है बल्कि यह वहीं सस्ते लोन का निवेश है जिसमें फंसकर श्रीलंका जैसे कई देश चीनी कर्ज के भार से बिल-बिला रहे हैं और अपने सम्प्रभुता का सौदा कर अपनी जमीन पट्टे पर चीन को दे रहें हैं। कहा तो ये भी जा रहा है कि यह चीन के वन बेल्ट वन रोड़ का ही पार्ट है। जो पश्चिम एशिया तथा मध्य एशिया को चीन के व्यापारिक क्षेत्र से जोड़ेगा। जिससे बड़े पैमाने पर व्यापार होगा और संबंधित देशों को लाभ होगा।

लेकिन जिस तरह से एक बड़ी रकम इसमें खर्च की जा रही है। उसको देखते हुए इस प्रोजेक्ट से लाभ होगा इसमें संदेह है। ताजुब है कि पाकिस्तान श्रीलंका से सबक नहीं ले रहा है, जो चीन के कर्ज के दलदल में फंसकर कराह रहा है। ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही घातक होगी बल्कि चीन के लिए भी यह परेशानी का सबब बन सकती है।

यदि इतना भारी निवेश के बाद यह हम्बनटोटा या फिर पोलैण्ड की तरह सफेद हाथी बन कर रह जाये तो क्या चीन की अर्थव्यवस्था इस घाटे को बर्दाश्त कर सकेगी यह समय के गर्भ में है। साथ ही इस प्रोजेक्ट का एक बड़ा हिस्सा अशांत बलूचिस्तान से गुजरता है। अत: इस प्रोजेक्ट में खर्च सुरक्षा अतिरिक्त होगा। तथा बलूच राष्ट्रवादियों से इसे हमेशा खतरा रहेगा क्योंकि वे इसका विरोध कर रहे हैं।

वास्तव में यह प्रोजेक्ट भी चीन की मोंतियों की माला के सिद्धांत पर ही आधारित है। जिसका उद्देश सिर्फ आर्थिक ही नहीं है। यह चीन का कोई आर्थिक संबंधो को लेकर नीति नहीं बल्कि उस देश के सामरिक भाग का प्रत्यक्ष नियंत्रण प्राप्त करने का साधन है। इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण हिन्द-प्रशात क्षेत्र पर प्रत्यक्ष नियंत्रण का है। जिसमें जापान से लेकर भारत तक का सम्पूर्ण क्षेत्र समाहित है। इस क्षेत्र में सामरिक तथा राजनीतिक वर्चस्व का यह चीनी प्रयास है।