ये है वो 7 वजह जिससे गुजरात में हारी कांग्रेस

By Team Khabare Dec 19, 2017 3:40 pm

why congress lose gujarat assembly election
अश्विनी ‘सत्यदेव’

गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भले ही हार हुई हो लेकिन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी इस हार को जीत के रूप में देखते हैं। वो मानते हैं कि, ये चुनाव परिणाम कांग्रेस को नहीं बल्कि मोदी और बीजेपी को एक तीखा संदेश है। बहरहाल, कांग्रेस गुजरात में हार चुकी है, बीजेपी पूर्ण बहुमत में है और गुजरात के नये सरदार के चयन प्रक्रिया में व्यस्त है। तो आइये हम इस चुनावी गुबार में खो गये उन बातों को खंगालते है जो कांग्रेस की हार का कारण बनी, हम आपको उन 7 वजहों के बारे में बतायेंगे जिसके चलते कांग्रेस गुजरात का दुर्ग जीतते जीतते रह गयी।

पाटीदारों को जोड़ने में नाकाम:
गुजरात चुनाव में जो सबसे बड़ा मुद्दा था वो था पाटीदार। पाटीदारों को लेकर हर पार्टी काफी संजीदा थी, सभी इस बात को जानते थें कि पाटीदारों का पूर्ण समर्थन सूबे में सत्ता की अहम सीढ़ी बन सकती है। शायद इस बात से कांग्रेस भी वाकिफ थी और उसने कई बार पाटीदारों को अपने साथ करने का प्रयास किया। इसके लिए कई बार पाटीदारों और कांग्रेस पार्टी मे मीटिंग भी हुई लेकिन राहुल गांधी पूरी तरह से पाटीदारों को संतुष्ट नहीं कर सकें और आखिरी समय तक दोनों के समझौतों के बीच उहापोेह की स्थिती बनी रही। एक तरफ ये बात जगजाहिर थी कि, पाटीदारों का खेमा वर्तमान प्रदेश सरकार से क्रोधित है लेकिन राहुल गांधी पाटीदारों के इस गुस्से को पूरी तरह से भुना नहीं पायें। एक तरफ ग्रामीण इलाकों में राहुल गांधी का दखल बेहतर था लेकिन शहरी इलाकों में राहुल गांधी का प्रभाव कम ​देखने को मिला।

गुजरातियों का बनिया दिमाग:

ये बात सर्वविदित है कि, गुजराती उड़ती धूल से भी मुनाफा निकालने में निपुण होते हैं और इसका मुख्य कारण होता है उनका बनिया दिमाग। यही दिमाग गुजरातियों ने इस चुनाव में भी लगाया। जानकारों का मानना है कि, गुजरात की जनता में जीएसटी और नोटबंदी को लेकर रोष था लेकिन अहम वक्त पर वो रोष खत्म हो गया। इसके पीछे एक कारण ये भी था कि, ज्यादातर गुजराती इस बात को मानते थें कि, सूबे में उसी पार्टी की सरकार हो जो केंद्र में भी काबिज हो। क्योंकि वो गुजरात में हो रहे किसी भी विकास कार्यों पर कोई अंकुश नहीं लगने देना चाहते थें। ज्यादातर लोग मानते हैं कि, आगामी 2019 सामान्य चुनाव में अभी दो साल बाकी है और इन दो सालों में यदि कांग्रेस गुजरात का कमान संभालती है तो गुजरात में विकास कार्यों का ठप्प हो जाना स्वाभाविक सी बात होगी क्योंकि केंद्र की योजनाओं पर नियंत्रण तो मोदी का ही रहेगा। तो गुजरातियों के एक बड़े तबके ने मुनाफे को वरीयता देते हुए बीजेपी को ही चुनना सही समझा।

कांग्रेस का मणि दूसरी टीम की तरफ से तो नहीं खेल रहा है:

इस बात पर शक होना लाजमी है हालांकि, इसमें सच्चाई कत्तई भी नहीं है लेकिन दिमाग का क्या वो तो दौड़ेगा ही। जी हां, कांग्रेस के ​वरिष्ठ नेता कई बार अपनी काली जबान के चलते कांग्रेस को मुश्किल में डाल चुके हैं। जब राहुल गांधी जीत के लिए मैदान में मेहनत कर रहे होते हैं उसी वक्त मणिशंकर अय्यर का मुंह खुलता है और कांग्रेस के किस्मत के दरवाजे बंद हो जाते हैं। इस बार भी चुनावी घमासान के बीच ही अय्यर ने पीएम मोदी को नीच कह दिया और बीजेपी ने इस वक्तव्य को एक बड़ा मुद्दा बनाते हुए मोदी का नहीं बल्कि गुजरात का अपमान करार दिया। भले ही अय्यर के इस बयान के चलते उन्हें कांग्रेस की तरफ से सजा मिली हो लेकिन असली सजा तो अब पार्टी खुद भुगत रही है।

पार्टी में जुनून की कमी:

इस चुनाव में कैम्पेन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खासे उत्साहित थें और वो ज्यादातर रैलियों में मोदी और बीजेपी को घेरने में सफल होते नजर आयें। लेकिन राहुल के अलावा उनकी गुजरात कांग्रेस के अन्य नेता, कार्यकर्ता और समर्थकों में वो आत्मविश्वास नजर नहीं आ रहा था। जिस तरफ गुजरात में मोदी की रैलियों में उनके समर्थकों मेें उत्साह और जोश दिख रहा था वैसा कांग्रेस में नहीं था। ऐसा कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस चुनाव में राहुल के अलावा अन्य कांग्रेसियों ने अपना शत प्रतिशत योगदान नहीं दिया और पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।

बिना ख्वाबों के मैदान में उतरें राहुल:

ये बात सभी जानते हैं कि जब आपको किसी को अपनी तरफ आकर्षित करना है खासकर तब जब वो अगला 27 सालों से रूठा हो उस वक्त आपकों खास लोक लुभावने उपहारों के साथ उसके सामने जाना चाहिए था। कुछ नहीं तो उस जनता को अच्छे सपने तो राहुल दिखा ही सकते थें। लेकिन इस मामले में भी राहुल, मोदी से पिछे हो गयें। कांग्रेस के पास गुजरात के लिए कोई सपना या तगड़ा विजन ही नहीं था। वो हर जगह केवल मोदी सरकार में खामियां निकालने में ही लगे रहें। वहीं नरेंद्र मोदी हर रोज गुजरात को विकास की बाते करते हुए ​नये सपने दिखाते रहें।

भाषा भी बनी बड़ी वजह:

इस चुनाव में कैम्पेनिंग के दौरान एक बड़ा अंतर भाषा के तौर पर भी देखने को मिला। एक तरफ नरेंद्र मोदी ने पूरे गुजरात में अपनी देशी भाषा का प्रयोग किया जो कि लोगों को जोड़ने में काफी कारगर साबित हुआ। वहीं राहुल गांधी जो कि हिंदी भाषा से गुजरातियों को एक करने के प्रयास में लगे थें। जानकारों का मानना है कि, राहुल गांधी द्वारा गुजराती भाषा का प्रयोग न कर पाना भी कांग्रेस के प्रति लोगों के आकर्षण में कमी का मुख्य कारण थी।

सिर्फ एक कंधे पर पूरी जिम्मेदारी:

जहां इस चुनाव में अपनी साख पर दांव लगता देख भाजपा ने गुजरात में अपने मंत्रिमंडल सहित 7 मुख्यमंत्रियों की फौज को उतार दिया था वहीं कांग्रेस इस मामले में भी बीजेपी से पीछे दिखी। कांग्रेस के पास राहुल गांधी के अलावा कोई भी बड़ा और कद्दावर चेहरा नहीं था जिस पर गुजराती भरोसा कर सकें। राहुल गांधी के ही कंधे पर पूरी जिम्मेदारी थी वहीं उनके कोशिशों में कुछ कांग्रेसी बट्टा लगाते जरूर देखे गयें।

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