आतंकवाद पर पिटता पाकिस्तान

  By : Rahul Tripathi | February 27, 2018 7:39 pm

राहुल त्रिपाठी

आतंकवाद को पालना-पोषना पाकिस्तान के लिए अब भारी पड़ रहा है। विश्व जमात ने, पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन देने के लिए एक बार पुन: उसको दंडित किया है। अभी हाल ही में 23 फरवरी को पेरिस में हुए वित्तीय ऐक्सन टास्क फोर्स की मीटिंग में पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में शामिल किया गया है। जिसके अन्तर्गत आतंकवाद फंडिंग के लिए पाकिस्तान पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी। पाकिस्तान के लिए अब आतंकवाद को किसी भी रूप में समर्थन करना और उसे अपनी विदेश नीति का साधन बनाना मुश्किल हो जाएगा।

पाकिस्तान ने भारत से अपने सीमा विवाद तथा कश्मीर की समस्या को हल करने के लिए आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का जरिया बनाया। आतंकवादी हमले कर वह भारत को अस्थिर तथा आतंकित करके कमजोर और विवश करना चाहता है जिससे वह कश्मीर सहित सभी सीमा विवाद को अपने पक्ष में हल कर सके, साथ ही साथ बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करवाने के लिए भारत से बदला भी ले सके। जम्मू कश्मीर सहित सम्पूर्ण भारत में ब़ढ़ती हुई आतंकी घटनाऐं पाकिस्तान की इसी नीति का परिणाम है।

भारत से अपनी सीमा विवाद को आपने पक्ष में करने के लिए पाकिस्तान अब तक चार बड़े युद्ध करके भी जब इसमें सफल नहीं रहा तो 80 के दशक में आकर उसने आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण औजार बनाया। साथ ही साथ जब भारत ने 1974 में अपना पहला परमाणु बम का परीक्षण किया तो पाकिस्तान भी चोरी छिपे अपना परमाणु कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिससे वह सामरिक रूप से भारत से कमजोर न रह जाए।
तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो ने कहा था कि हम घास खाकर भी परमाणु बम बनायेंगे। शीत युद्ध की विवशता के कारण अमेरिका पाकिस्तान की इन कारगुजारियों को नजरअंदाज करता रहा। साथ ही पाकिस्तान अपनी सामरिक अवस्थिति के कारण उस समय अमेरिका का महत्वपूर्ण सामरिक साझेदार था।

आफगानिस्तान से रूस को हटाने लिए पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सहयोग की अमेरिका को बहुत अधिक आवश्यकता थी। रूस को अफगानिस्तान में हराने लिए पाकिस्तान में अमेरिकी सहयोग से मुजाहिद्दीनो की फौज तैयार की गयी। इसके लिए पाकिस्तान को अमेरिका से बड़े पैमाने पर आर्थिक तथा सैनिक सहायता प्रदान की गयी।

इसी सहायता का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ एक बड़े आतंकी नेटवर्क को खड़ा करने में किया गया। जिसका प्रयोग वह भारत के खिलाफ आज भी कर रहा है। 90 के दशक आते आते रूस को अफगानिस्तान से हटना पड़ा और इसके बाद रूस कमजोर होकर कई देशों में बंट गया। रूस के पराजय के साथ ही शीत युद्ध समाप्त हो गया।

पाकिस्तान ने अफगान मुजाहिदों तथा अमेरिका द्वारा छ़ोडे गये हथियारों को भारत के विरुद्ध आतंकवादी हमलों में प्रयोग किया। शायद पाकिस्तान का आतंकी खेल चलता रहता लेकिन अमेरिका में हुए एक बड़े आतंकी हमले ने सबकुछ बदल कर रख दिया, जिसको दुनिया 9/11 के नाम से जानती है। पूरा विश्व इस विभत्स आतंकी हमले को देखकर स्तब्ध रह गया। जिसके बाद आतंकवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण विश्व में एक बड़ा जनमत तैयार हो गया।

बदली हुई परिस्थिति में अब पाकिस्तान के लिए अपना आतंकी कार्यक्रम को चलाना आसान नहीं रह गया लेकिन पाकिस्तान है कि सुधरा ही नहीं और बराबर आतंकी समूहों को समर्थन देने की नीति पर चलता रहा। साथ ही जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए हस्ताक्षेप किया तो पाकिस्तान द्वारा पोषित और संरक्षित तालिबान एवं अन्य आतंकी समूहों ने अमेरिकी सेना तथा निर्दोष अफगानी नागरिकों पर हमला करने लगे। ये हमले समय के साथ बढ़ते गये और अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में काम करने के हालात बत से बत्तर होते गये।

क्योकि इन आतंकी संगठनों को पाकिस्तान का संरक्षण मिला हुआ था। यहां तक की अलकायदा का नेता तथा 9/11 का दोषी ओसमा-विन-लादेन को अपनी सैनिक छावनी के निकट ऐबटाबाद में पूरी दुनिया से छिपा के रखा हुआ था जो अमेरिकी सील कमांडो द्वारा 2008 में मार गिराया गया। इस घटना के बाद पाकिस्तान का सच सम्पूर्ण विश्व के सामने आ खड़ा हुआ। स्थिति यह है कि पाकिस्तान और आतंकवाद का नापाक गठजोड़ दुनिया के सामने आ गया।

आज हालात यहां तक आ गये हैं कि विश्व का शायद ही ऐसा कोई देश होगा जो इन आतंकी विचार धाराओं या फिर घटनाओं से प्रभावित न हो रहा हो। पश्चिम एशिया और अफ्रीका से लेकर सम्पूर्ण विश्व में घटने वाली आतंकी घटनाओं का सम्बन्ध कहीं न कहीं पाकिस्तान से जुड़ा रहता है।
इसके वाजिब कारण भी हैं क्योंकि पाकिस्तान ने आतंकियों की फौज तैयार करने के लिए मज़हवी मदरसों का जाल बिछ़ा रखा है और इसके लिए साउदी अरब जैसे देशों से बहावी विचारधारा के प्रसार-प्रचार के नाम पर अकूत धन पाकिस्तान आता है। पाकिस्तान इस धन का प्रयोग आतंकवाद के प्रचार-प्रसार में करता रहा है।

आतंकवाद के लिए होने वाले फंडिंग को रोकने के लिए ही वित्तीय ऐक्सन टास्क फोर्स (एफएटीएफ ) का गठन सन 1989 में किया गया है, विश्व के 35 बड़े देश इस संगठन के सदस्य हैं। प्रारम्भ में इस संगठन का कार्य मनी लांड्रिंग तथा अवैध लेन देन पर निगरानी रखना था। परन्तु 2001 के बाद आतंकवाद को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।

इस साल पेरिस में हुई एफएटीएफ की मीटिंग में पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाला गया है। सदस्य देशों द्वारा पाकिस्तान में होने वाली आतंकी फंडिंग पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान को इसमें पहली बार डाला गया है। इसके पहले 2012 से 2015 के बीच पाकिस्तान को एफएटीएफ की वॉच लिस्ट में डाला गया था लेकिन तब अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में था जिसके कारण उसका अधिक नुकसान नहीं हुआ था। पर अब स्थितियां काफी बदल गयी हैं निश्चय ही पाकिस्तान के लिए आने वाला समय अब बहुत कठिन समय होगा।

नि:संदेह यह भारतीय विदेश नीति की एक बडी कूटनीतिक विजय है। क्योंकि हम बहुत समय से विश्व को पाकिस्तान द्वारा चलाए जा रहे आतंकी कार्यक्रम से आगाह कर रहे थे। पाकिस्तान को आतंकवाद फांडिंग की निगरानी लिस्ट में रखने वाला प्रस्ताव अमेरिका द्वारा पेश किया गया जिसको भारत, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने समर्थन किया। पहले सऊदी अरब, तुर्की तथा चीन इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे लेकिन बाद में इन्होंने अपनी आपत्तियां वापस ले लीं। तारीफ तो इस बात में है कि पाकिस्तान के खास दोस्त चीन ने भी उसका साथ नहीं दिया।