क्या संविधान से बढ़कर है करणी सेना ?

  By : Team Khabare | January 22, 2018 5:59 pm

अश्विनी ‘सत्यदेव’

नई दिल्ली। ए​क फिल्म बनी जिसका आधार एक किताब थी, फिल्म बनाने वाले ने ये कभी नहीं सोचा था कि, लोग उसके फिल्म कौशल को तालियों के बजाय गालियों से नवाजेंगे। सड़क से लेकर न्यायपालिका तक हर जगह उसे ये साबित करना होगा कि, उसने किसी के सम्मान को ठेंस पहुंचाने के लिए फिल्म का निर्माण नहीं किया है। लेकिन फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही तथाकथित क्षत्रिय समाज बिना फिल्म के देखे ही ऐसा आग बबूला हो गया कि उसने देश के संविधान को ही चुनौती दे दी।

खैर भारत लोक​तांत्रिक देश है यहां पर सबको अपनी बात रखने का अधिकार है लेकिन इसका ये उद्देश्य कत्तई नहीं है कि आप अपनी मनगढ़ंत बात को सही साबित करने के लिए लोकतंत्र का ही गला घोट दें। पद्मावत की कहानी कोई नई नहीं है, आज से सैकडों साल पहले सन 1540 में सूफी संत मलिक मोहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ की रचना की थी और तब से लेकर आज तक ये रचना हमारे समाज में है।

तो क्या नेहरू के वक्त देश में नहीं थे क्षत्रिय:

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1942-46 में महाराष्ट्र के अहमदनगर किले में अपने कारावास के दौरान एक किताब लिखी थी जिसका नाम ‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया’ है। नेहरू ने अपनी इस किताब में देश के विविधताओं, इतिहास और संस्कृतियों के बारे में बताया है। उन्होनें अपने इस किताब में जायसी की उसर किताब को आधार मानकर रानी पद्मावती की कहानी का भी जिक्र किया है। इतना ही नहीं इस किताब के छपने के वर्षो बाद मशहूर फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल ने सन 1988 में नेहरू के इसी किताब के आधार पर दूरदर्शन पर एक धारावाहिक प्रसारित किया जिसका नाम था ‘भारत एक खोज’ इस धारावाहिक में भी रानी पद्मावती की कहानी को पूरे देश में दिखाया गया जिसमें मरहूम अभिनेता ओम पूरी ने अलाउद्दीन खिलजी का रोल अदा किया था।

लेकिन क्या नेहरू के समय भारत की धरा क्षत्रिय विहीन हो चुकी थी जो विरोध की एक आवाज भी नहीं उठी थी। वहीं आज जब एक बार फिर से उसी कहानी को फिर से दिखाने की कवायद हुई है तो आज तथाकथित पद्मावती के अस्मत की रक्षक बौखला क्यों गये है।

एक तरफ फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली के उपर आरोप लगाया गया है कि उन्होनें फिल्म में क्षत्रियों और हिंदूओं के रानी की छवी को खराब करने की कोशिश की है। अब आप स्वयं विचार किजीए कि, किसी समुदाय या फिर धर्म की छवी को आखिर कोई कैसे खराब कर सकता है। या फिर किसी की छवि को खराब करने के लिए कोई व्यक्ति 190 करोड़ रुपये खर्च करके फिल्म का निर्माण क्यों करेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि, पद्मावत फिल्म का विरोध निराधार और बेवजह है। लेकिन फिल्म का विरोध कर रही करणी सेना ने बीते दिनों सड़कों पर जो हंगामा किया है उसे रोकने में सरकार भी नाकाम हो गई है। एक तरफ हरियाणा सरकार ने यहां तक कह दिया है कि, वो सिनेमा हालों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए तैयार है लेकिन यदि फिल्म को रिलीज न किया जाये तो ही बेहतर है।

बताइये, खट्टर सरकार ने तो चंद मामूली मुंह पर पकड़ा बांधे और हाथ में डंडा लिये शोहदों के सामने ही घुटने टेक दिए। ये वही सरकार है जो अपने राज्य मे अर्से से राम रहीम के कारोबार को बढ़ने दे रही थी और पंचकुला हिंसा की मास्टर माइंड हनीप्रीत को पकड़ने में महीनों लगा दिया। ये वही सरकार है जो 5 दिन के भीतर 6 बलात्कार की घटनाओं और स्कूल में 7 साल के बच्चे की निर्मम हत्या की चश्मदीद है। लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है इन्होनें अपने हथियार पहले ही डाल दिये है।

दिल्ली, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और यूपी में करणी सेना ने जमकर तांडव मचाया है। टीवी पर डिबेट के दौरान करणी सेना के समर्थक और नेता खुलेआम संविधान को और न्यायपालिका को गाली दे रहे है। फिल्म निर्माता और उससे जुड़े कलाकारों को सिर कलम करने और मारने की धमकी दी जाती है। सेंसर बोर्ड के चेयरमैन को जयपुर आने पर पीटने की धमकी दी जा रही है और इन सबके बावजूद सरकार मूक दर्शक बनी हुई है।

आखिर ये कैसी चुप्पी है जो सबकुछ देखते हुए भी बरकरार है। क्या ये सरकार केवल किसानों और अपने हक की लड़ाई करने वाले मजलूमों पर ही लाठीचार्ज करना जानती है। यदि ऐसा है तो गंगा में बहा दिजीए संविधान को और पद्मावती की इस आग में जल जाने दीजिए पूरे देश को। क्योंकि अब ये देश संविधान नहीं बल्कि करणी सेना चला रही है।