रक्षा क्षेत्र में अत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ता भारत

  By : Rahul Tripathi | March 27, 2018

राहुल त्रिपाठी

आज भारत एक शक्तिशाली देश है। भारत के पास विश्व की दूसरी बड़ी सेना है, जिसका सलाना रक्षा बजट लगभग 56 अरब डालर का है। यह विश्व के बड़े रक्षा बजट वाले देशों में पांचवा बड़ा रक्षा बजट है। भारत के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। अभी हाल ही में हमारी सेना ने पोखरण फायरिंग रेंज में सुखोई विमान से ब्रम्होस क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। जिसके साथ ही भारतीय वायु सेना के फाइटर प्लेन क्रूज मिसाइल से लैस होने वाली दुनिया की पहली सेना हो गयी है। अभी तक दुनिया की किसी भी देश की सेना इस प्रकार की क्षमता से लैस नहीं है।

वहीं दूसरी तरफ सुपर पावर का दावा करने वाली हमारी सेना आज भी अपनी रक्षा जरूरत का 70% हिस्सा जापान, फ्रांस, रूस, इजराइल तथा सं. राज्य अमेरिका से आयात के द्वारा पूरा करती है। भारत जैसे शक्तिशाली और क्षमतावान देश की सेना का अपनी रक्षा जरूरतों के लिए यह विदेशी निर्भरता अपने आप में एक संकट से कम नहीं है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान समय में भारत विश्व सबसे बड़ा खरीददार है। हम अपनी बजट का 2.14% भाग रक्षा जरूरतों में खर्च करते हैं। इसके बाद भी हम रक्षा में आत्मनिर्भरता से अभी कोसों दूर हैं।

वर्ष 1962 के चीन युद्ध के समय पहली बार रक्षा साजो सामान में पहली बार आत्मनिर्भरता को महसूस किया गया। इसके बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की स्थापना की गयी। लेकिन मिसाइल विकास को छोड़कर, अन्य रक्षा उकरणों के निर्माण में इसका काम संतोषजनक नहीं रहा है। अन्य सरकारी विभागों की तरह यह भी नौकरशाही, लेटलतीफी का पर्याय बनकर रह गया है। रक्षा उद्योग एक क्रमिक तथा अधिक पूंजी वाला उद्योग है। यह दर्भाग्य की बात है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी इसको लेकर सरकारों में एक स्पष्ट नीति का आभाव रहा है।

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2015 में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए नयी नीति making India program को प्रारम्भ किया। वर्ष 2016 में रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को प्राप्त करने के लिए सरकार ने नई डिफेंस प्रोक्योरमेंट पोलिसी को निर्माण किया गया। जिसके अन्तर्गत रक्षा उपकरणों के निर्माण में निजी भागेदारी को बढ़ाने के साथ साथ खरीद प्रक्रिया को आसान करना था। साथ ही making India program के अन्तर्गत विदेशी भागेदारी को सुनिश्चित करके आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा पूंजी का भारत रक्षा उद्योग में निवेश करना भी है।

वास्तव में हाल के कुछ वर्षों में भारत ने पहले से चली आ रही हथियार क्रेता की छवि को तेजी से बदलने का प्रयास कर रहा है और आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़कर एक निर्यात देश के लक्ष्य को प्राप्त करने के करीब है। पिछले वर्ष 3 नवम्बर को देश ही में DRDO द्वारा विकसित लेजर गाइडेड बम का उड़ीसा के चांदीपुर परीक्षण रेंज में जगुआर तथा सुखोई विमानों के द्वारा परीक्षण किया गया। इसके अतिरिक्त देश में विकसित दूसरा क्रूज मिसाइल निर्भय का भी चांदीपुर में सुखोई विमानों से परीक्षण किया गया। यह 1000 हजार किमी मार करने वाला सब सानिक क्रूज मिसाइल है।

गौरतलब है कि गाइडेड बम का विकास भारत में 2006 में ही कर लिया था। जिसको सुदर्शन नाम से जनवरी 2013 में वायु सेना में शामिल कर लिया गया है। हालांकि गाइडेड बम का प्रथम प्रयोग जर्मनी ने प्रथम विश्व युद्ध के समय इतालवी युद्ध पोत पर किया था। जिसको फ्रिट्ज एम्स नाम दिया गया था और इसका वजन 1400 किग्रा था। लेकिन भारत द्वारा विकसित इस नये स्मार्ट बम को सॉ ( smart anti airfield weapon) कहा जाता है।

ऐसा भी नहीं है कि हम जो रक्षा सजो सामान तैयार कर रहें हैं वह विकसित देशों से किसी मायने में कमतर है। निर्भय क्रूज मिसाइल की समानता अमेरिका की सबसे बेहतर टॉम हाक क्रूज मिसाइल से की जा रही है। यह मिसाइल 1000 किमी तक 3000 किग्रा आयुध ले जाने में सक्षम है। वर्तमान समय में हमारा मिसाइल प्रोग्राम विश्व के चुनिंदा देशों की श्रेणी में आता है। हमारा देश बैलेस्टिक से लेकर क्रूज सभी प्रकार की मिसाइल में आत्मनिर्भर हो चुका है। इतना ही नहीं ब्रम्होस जैसी हमारी मिसाइल विश्व की सबसे उन्नत मिसाइलों में शुमार करती हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि भारत ने अभी तक अपनी क्षमताओं के अनुरूप प्रदर्शन नहीं किया है।

भारत अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने मित्र देशों के साथ मिलकर रक्षा उत्पाद के निर्माण के कार्य को आगे बढ़ा रहा है। रूस के साथ मिलकर बम्होस क्रूज मिसाइल का प्रोग्राम चलाया जा रहा है। साथ ही इजराइल के साथ बराक हवाई सुरक्षा प्रणाली तथा हल्के आधुनिक हथियारों का विकास किया जा रहा है। फ्रांस के साथ मिलकर स्कार्पियन पनडुब्बी तथा राफेल विमानों के निर्माण काम किया जा रहा है।

फ्रांस राष्ट्रपति के हालिया भारतीय दौरे में फ्रांस ने making India program के तहत काम करने की इच्छा जाहिर किया है। इसके अतिरिक्त अमेरिका, स्वेडन जैसे अग्रणी फाइटर प्लेन निर्माता देश आज भारत के साथ मिलकर विमानों का निर्माण करना चाहती हैं। संक्षेप में कहें तो आज भारत रक्षा उत्पात को लेकर बहुत संजीदा है और वह दिन दूर नहीं जब भारत रक्षा उपकरणों का प्रमुख निर्यातक देश होगा।

भारत का रक्षा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर रहना न केवल सामाजिक दृष्टि से हेय है बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ है। यह रोजगार तथा तकनीकी विकास की राह में एक अवरोध का कार्य करता है। यदि भारत को अपनी सम्प्रभुता को सुरक्षित रखते हुए विश्व के राजनीतिक पटल पर एक प्रमुख सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित होना है। तो उसे अपनी सैन्य क्षमताओं का विस्तार, एक सुपर पावर के रूप में ही करना होगा। इसके लिए निजी उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करना होगा, साथ ही प्रशासनिक सहयोग और द्रढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी परिचय देश के राजनीतिक नेतृत्व को देना होगा।