मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग: निशाने पर अयोध्या!

  By : Rahul Tripathi | March 28, 2018 6:54 pm

राहुल त्रिपाठी

क्रेन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के बढ़ते जनाधार और हिंदुत्व के उभार से राज्यों में उनकी सरकार बनती जा रही है। जिससे विपक्षी तथा क्षेत्रीय दलों में अपने अस्तित्व को लेकर भय व्याप्त हो गया है। इसी का परिणाम है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में विपक्षी दलों की एकता को लेकर, गंभीर प्रयास किया जा रहा है। विपक्षी एकता के जोर शोर प्रयासों के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा पर महाभियोग प्रस्ताव लाने का प्रयास किया जा रहा है।

प्रमुख वामपंथी पार्टी सीपीएम के महासचिव सीता राम येचुरी विपक्षी दलों के साथ मिलकर जनवरी से ही सीजेआई के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की चर्चा कर रहे थे। लेकिन प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस में इसको लेकर मतभेद था। न्यायपालिका में दखल को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी सहमत नहीं थे। लेकिन कई बैठकों के बाद कांग्रेस महाभियोग के प्रस्ताव को लेकर तैयार हो गयी। कांग्रेस के नेता डीएमके, समाजवादी, एनसीपी तथा बामपंथी पार्टियों के राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर लेने के प्रयास में लग गये हैं।

वास्तव में यह प्रयास सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश के कार्य प्रणाली को लेकर उठाये गये प्रश्नों के बाद की कड़ी है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने मीडिया के सामने आकर न्यायालय में व्याप्त अनियमितता तथा सीजेआई की कार्यप्रणाली को लेकर प्रश्न उठाए थे। हालांकि मीडिया में इस तरह का बयान देना, कही न कहीं उन न्यायाधीशों के मनतव्य पर भी प्रश्न खड़ा करता है। खास तौर से तब जब जस्टिस जे चेलमेश्वर ने इस घटना के बाद वामपंथी नेता डी राजा से मुलाकात की।

ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजमी हो जाता है कि, कहीं इन न्यायाधीशों का राजनैतिक उद्देश्य के लिए, तो इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इस तरह के बयान से देश की जनता में यह संदेश देने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है कि देश में सब कुछ सामान्य नहीं है। इन सभी बातों से इन्कार नहीं किया जा सकता। खासतौर से तब जबकि वामपंथियों के साथ मिलकर कांग्रेस अब मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने जा रही है।

अब तो यह साफ तौर पर स्पष्ट हो जाता है कि चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का राजनैतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया गया था। हालांकि बाद में जस्टिस चेलेमेश्वर को छोड़कर अन्य न्यायाधीशों ने इस विवाद से अपने को अलग कर लिया था। साथ ही इन जजों ने अपने बयान में कहा कि यह हमारा आन्तरिक मामला है और हम इसमें किसी बाहरी का हस्ताक्षेप नहीं चाहते।

गौरतलब है कि चाहे सर्वोच्च न्यायालच के चार न्यायाधीशों का संवाददाता सम्मेलन रहा हो या फिर अब विपक्षी पार्टियों द्वारा लाया जा रहा महाभियोग प्रस्ताव हो। यह सभी कयावद सिर्फ इस बात के लिए है कि किसी भी स्थिति में 2019 से पहले राम मंदिर पर कोई फैसला न हो सके। क्योंकि जस्टिस दीपक मिश्रा इस मुकदमें पर तेजी से सुनवाई के पक्ष में है, और उम्मीद है कि इस पर फैसला बहुत जल्द आ जायेगा।

विपक्षी पार्टियां यह किसी भी हाल में नहीं होने देना चाहती हैं। उन्हें डर है कि यदि यह फैसला 2019 के आम चुनाव से पहले आ गया, तो इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा और देश की सत्ता उनके लिए दूर की कौड़ी साबित होगी। इसको मुस्लिम पक्षकारों के वकील कपिल सिब्बल, जोकि कांग्रेस पार्टी के प्रतिष्ठितम नेता भी हैं, के कथन से समझा जा सकता है जो उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गुजारिश की थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि कृपया इस मसले की सुनवाई को 2019 के आम चुनाव तक स्थगित कर दें। क्योंकि इससे किसी पार्टी विशेष को फायदा पहुंचेगा।

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उनके इस अनुरोध को ठुकरा दिया। न्यायालय इस मसले को जल्द से जल्द हल करने के पक्ष में है। कांग्रेस तथा अन्य तथाकथित सेकुलर पार्टियां इस विवादित मसले को टालना चाहती हैं जिससे वे तुष्टीकरण की राजनीति कर सकें जोकि वह अब तक करती आई हैं। नहीं तो फिर क्या कारण है? कि आजादी के इतने साल बाद भी यह मसला हल नहीं हो सका है। इतने वर्षों से इस जैसे संवेदनशील मसले को उठाकर वे वोट बैंक की राजनीति करती आई हैं।

वास्तव में राजनीतिक के तहत मुख्य न्यायाधीश को निशाना बनाकर, न्यायालय में इस मामले की सुनवाई को स्थगित करने का यह एक षड़यंत्र है। ऐसा भी नहीं है कि यह बहुत आसान है। भारतीय संविधान में न्यायालय तथा न्यायाधीशों की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए विशेष उपबन्ध किए गये हैं। न्यायाधीशों को बहुत ही कठिन महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा ही हटाया जा सकता है।

भारत में न्यायपालिका एक संवैधानिक संस्था है और इसके न्यायाधीशों को केवल महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा ही हटाया जा सकता है। न्यायाधीशों पर चलने वाली महाभियोग की प्रक्रिया का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 124(5) में किया गया है। जो राष्ट्रपति के महाभियोग के समान ही है। इस प्रस्ताव को संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है और उसे दोनों ही सदनों से विशेष या 2/3 बहुमत से पास होना आवश्यक है।

न्यायाधीशों पर महाभियोग का प्रस्ताव किसी भी सदन में लाया जा सकता है। लेकिन यदि यह लोकसभा में लाया जाता है तो 100 सदस्यों का, और यदि राज्यसभा में लाया जाता है तो 50 सदस्यों के द्वारा अनुमोदित होना चाहिए। जिस सदन में इस प्रस्ताव को लाया जाता है, उस सदन का सभापति एक तीन सदस्यी समिति गठित करता है। समिति का अध्यक्ष सर्वोच्य न्यायालय का कार्यकारी न्यायाधीश होगा। दूसरा सदस्य देश के किसी भी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश होगा। तीसरा सदस्य ख्याति प्राप्त विधिवेत्ता होगा।

यह समिति उस प्रस्ताव की जांच करेगा और यदि जज इस जांच में निर्दोष सिद्ध हुआ तो सदन प्रस्ताव खारिज कर देगा। यदि जांच में जज दोषी पाया जाता है तो सदन उस प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित करके दूसरे सदन में भेजता है। दूसरा सदन भी इस प्रस्ताव को 2/3 बहुमत से पास कर देता है तो न्यायाधीश को उसी समय से पद मुक्त कर दिया जाता है।

न्यायापालिका के इतिहास में केवल एक बार ही किसी जज पर महाभियोग का प्रस्ताव सदन के समक्ष लाया गया था। न्यायमूर्ती रामास्वामी को समिति ने दोषी पाया लेकिन यह प्रस्ताव सदन से पास नहीं हो पाया था। वर्तमान परिस्थियों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि यह प्रस्ताव सदन से पास हो सकता है। अत: यह विपक्षी पार्टियों की न्यायपालिका पर केवल एक मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति का हिस्सा है। जिसके द्वारा वे अयोध्या मसले को 2019 के आम चुनाव तक टालना चाहती हैं।