पृथ्वी के गर्भ से निकलती आग: प्रकृति मानव द्वन्द

  By : Rahul Tripathi | June 9, 2018

राहुल त्रिपाठी

वर्तमान समय में हम आधुनिकता और विकास की मानवीय सभ्यता में निवास करने का दावा करते हैं। आज मानव अपने ज्ञान विज्ञान में विकास के बदौलत प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण की बात करते हुए अपनी सफलता पर इतरातें हैं। लेकिन जब प्रकृति जनित आपदाएं हमारे सामने आती हैं, तो हमारे दावे की हवा निकल जाती है, और हम उनके सामने दीन-हीन, निरीह और कमजोर नजर आते हैं। शायद तब हमारे वैज्ञानिक विकास और प्रकृति पर हमारी विजय जैसी धारणाओं पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है।

ऐसी ही एक प्राकृतिक आपदा 3 जून को हमारे सामने आई, जब मध्य अमेरिकी देश ग्वाटेमाला में सदी का सबसे खतरनाक ज्वालामुखी विस्फोट हुआ। जिसने 8 किलोमीटर के दायरे में सब कुछ तबाह कर दिया। दरअसल, राजधानी से 40 किलोमीटर दूर 3763 मीटर ऊंचे सक्रिय ज्वालामुखी वोल्कन डे फुगो में एक जबरदस्त भूकंप के बाद भयंकर विस्फोट हुआ। जिससे 700c तापमान वाली लावा की नदी 100 km/h की रफ्तार से रिहायसी बस्तियों की तरफ बढ़ी। जिसकी चपेट में आने से अबतक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और लगभग 200 लोग लापता हैं।

ऐसा नहीं है कि इस समय यही एक ज्वालामुखी लोगों को आफत में डाल रहा है। हाल ही में इसके अलावा एक और ज्वालामुखी ने लोगों का जीवन दुश्वार कर रखा है। यह ज्वामामुखी अमेरिकी प्रशासन के अन्तर्गत आने वाले हवाई द्वीप का कियाऊलुआ ज्वालामुखी है। जो पिछले 40 दिनों से धधक रहा है। और इससे निकलने वाला लावा बहकर आसपास के रिहायसी इलाकों में पहुंचकर लोगों के लिए परेशानी पैदा कर रहा है। साथ ही इसका लावा और जहरीले पदार्थ बहकर समुद्र में भी जा रहे हैं। जिससे मनुष्यों के साथ-साथ समुद्री जीवों पर भी खतरा उत्पन्न हो गया है।

वास्तव में ज्वालामुखी पृथ्वी के भू-गर्भ के ऊर्जा की निकासी का एक सुरक्षित माध्यम है। कल्पना कीजिए यदि यह ऊर्जा न निकले तो हमारी पृथ्वी का अस्तिस्व ही सुरक्षित नहीं रहेगा। क्योंकि यह ऊर्जा इक्ट्ठा होकर एक ऐसा भयंकर दृश्य उपस्थित कर सकती है। जिससे हमारी पृथ्वी हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है। ज्वालामुखी का उदभेदन हमेशा धरातल के कमजोर पटल पर ही होता है। जिसको तोड़कर ज्वालामुखी के पदार्थ बाहर आ सकें। धरातल पर ये कमजोर पटल विवर्तनिक क्रियाओं वाले प्लेटों के किनारे में पाये जाते हैं, विशेष रूप से महासागर और महाद्वीपों के किनारों वाले मिलन विंदु पर।

विश्व मानचित्र पर ज्वालामुखी वाले क्षेत्रों को देखने पर पता चलता है कि यह कुछ खास क्षेत्र में ही सक्रिय रहते हैं। इनको मोटा-मोटा चार क्षेत्रों में रखा जा सकता है। पहला और सबसे महत्वपूर्ण ज्वालामुखी क्षेत्र है-परि-प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र, यह क्षेत्र प्रशान्त महासागर के चारों ओर महाद्वीपों के साथ लगते हुए किनारों में फैला है। इस क्षेत्र में विश्व के 70 % ज्वालामुखी पाये जाते हैं। इसलिए इसको pacific ring of fire कहते हैं। ग्वाटेमाला का ज्वालामुखी फ्यूएगो जिसका कि हाल में विस्फोट हुआ है, इसी क्षेत्र का हिस्सा है। जो कैरिवियन प्लेट और प्रशान्त प्लेट के टकराने से बने कमजोर क्षेत्र में स्थित है। वहीं हवाई द्वीप का कियाऊलुआ प्रशान्त प्लेट के मध्य में स्थित है।

वैसे परि-प्रशान्त क्षेत्र में शामिल ज्वालामुखी दक्षिण अमेरिका के पेरू से लेकर उत्तरी अमेरिका के अलास्का तक फैला हुए हैं। साथ ही एशिया महाद्वीप में प्रशान्त के किनारे वाले क्षेत्रों में पाये जाने वाले ज्वालामुखी इसके अन्तर्गत शामिल हैं। इस क्षेत्र में जापान और फिलीपींस के ज्वालामुखी के साथ साथ इंडोनेशिया के ज्वालामुखी भी सम्मिलित हैं। इंडोनेशिया के सुंडा स्ट्रेट स्थित क्राकाटाओ ज्वालामुखी दुनिया का सबसे खतरनाक ज्वालामुखी है। 1883 में इसमें भयंकर विस्फोट हुआ था। जिससे द्वीप का 2/3 हिस्सा हवा में उड़ गया था और इसकी आवाज तुर्की तक सुनी गयी थी तथा इसके झटके को आस्ट्रेलिया तक महसूस किया गया था। इसमें करीब 3600 लोगों की मौत हुई थी।

दूसरा प्रमुख ज्वालामुखी क्षेत्र अलांटिक महासागर के मध्य में एक कटक के सहारे फैला है। इसमें आइसलैण्ड के हेकला, डेल्गाफेल तथा ऐजोर के साथ-साथ हेनरी द्वीप के ज्वालामुखी को शामिल किया जाता है। जिसका कि हाल ही में उद्भेदन हुआ था। यहां विश्व के 15% ज्वालामुखी पाये जाते है। तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र महाद्वीपों के मध्य में पाया जाता है। जो कनारी द्वीप से लेकर ईरान तथा भारत तक फैला है। इस क्षेत्र के प्रमुख ज्वालामुखी इटली के विसूवियस तथा स्ट्रामबोली हैं। चौथा ज्वालामुखी क्षेत्र प्रशान्त महासागर के मध्य में हवाई से कमचटका द्वीर तक फैला है।

प्रश्न यह उठता है कि इन क्षेत्रों में ज्वालामुखी का उद्भेदन क्यों होता है। अर्थात यहां ज्वालामुखी क्रिया का क्या कारण है। दरअसल, इन क्षेत्रों में प्लेटों का किनारा होने से धरातल पर दरार बन जाती है। जिससे होकर समुद्री पानी पृथ्वी के गर्भ में चला जाता है। जहां अत्याधिक ताप के कारण यह पानी वाष्प में बदलकर दरार वाले कमजोर पटल को तोड़ कर धरातल के बाहर आ जाता है। जिसको ज्वालामुखी का उद्गार कहते हैं। इन उद्गारों के साथ पृथ्वी के अन्दर की ऊर्जा भी निकलती रहती है, जिसके कारण पृथ्वी सुरक्षित है। इसलिए ज्वालामुखी को पृथ्वी की सुरक्षा दीवार कहते हैं।