दलित आंदोलन: नेतृत्व विहीन, महज एक बेकाबू भीड़

  By : Team Khabare | April 2, 2018

अश्विनी ‘सत्यदेव’

नई दिल्ली। हर रोज की तरह आज भी देश में सूरज अपने तयशुदा समय पर उदय हुआ लेकिन उसकी लालिमा जैसे जैसे उतरती गयी उसका रंग इंसानी सोच पर मानो हाबी होता गया। दिन चढ़ने के साथ ही कुछ संगठित लोगों का आंदोलन समाजिकता के निचले स्तर पर बैठने लगा। भारत बंद का आह्वान था, सरकार की नीतियों और देश के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देनी थी। लेकिन ये आह्वान किसी एक व्यक्ति या संगठन के कंठ का स्वर नहीं था, ये सिर पर चोगा बांधे, हाथों में लाठी डंडा, रिवाल्वर और अन्य हथियार लिये बेकाबू भीड़ की गर्जना थी। जो स्वयं को आदोलनकारी साबित करने पर आमदा थी।

इस आंदोलन का न तो कोई नेतृत्व कर रहा था और न ही ये भीड़ किसी विचारधार के झंडे तले खड़ी थी। जुबान पर बस एक ही नारा था, एससी एसटी एक्ट वापस करो, सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला बदलो और इसी गूंज के साथ सरकारी संपत्ति को स्वाहा करती ये भीड़ संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर की दुहाई का झंडा लिए आगे बढ़ रही थी।

यकीन मानिए नीला झंडा थाम लेने मात्र से कोई अंबेडकरवादी नहीं हो जाता। इस बेकाबू भीड़ को शायद अंबेडकरवाद का अल्लीफ बे..भी नहीं पता है। अगर याद करें तो… 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में भीमराव अंबेडकर ने 6 लाख लोगों को इकट्ठा किया था, और बड़े ही शांति से उन्हें बौध धर्म स्वीकार करवाया। न कोई आंदोलन था न हिंसा और न ही बलवा। जय भीम का झंडा थामे उन हाथों को शायद ये नहीं पता होगा कि, अंबेडकर ने ही देश में पहली बार दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया था। दलितों के खिलाफ सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। भीमराव अंबेडकर स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री एवं भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थें।

जिस नेता को ये संगठन अपना ईश्वर मानता है ये भीड़ उसी नेता के विचारधाराओं से अनजान है। क्या अंबेडकर सरकार के सभी नियमों और कानून से संतुष्ट थें। नहीं ऐसा नहीं था, उन्हें भी सरकार की कई नीतियों से परेशानी थी। जिसे वो हर पल बदलना चाहते थें लेकिन इसके लिए उन्होनें कभी कोई सरकारी बस नहीं जलायी और न हीं कभी उनके आंदोलन में किसी की मौत हुई।

लेकिन नेतृत्व विहिन इस बेकाबू भीड़ के आंदोलन में जो अब हिंसा और दंगा का रुप ले चुकी है उसमें अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है। करोड़ो रुपये की सरकारी संपत्ति स्वाहा हो चुकी है। कई लोग गंभीर रुप से घायल हो चुके है। लेकिन आंदोलन का असल स्वरुप अभी तक कहीं भी देखने को नहीं मिल रहा है।

महाराष्ट्र के किसान आंदोलन से लें सीख —

बीते 7 मार्च को महाराष्ट्र में किसानों ने अपनी मांगों के साथ एक आंदोलन की शुरूआत की थी। ऑल इंडिया किसान सभा (एआईकेएस) के बैनर तले ये सभी किसान आंदोलन कर रहे थें। इनकी कुछ मांगे थी, दिल में जोश था और दिमाग में अनुशासन था। लगभग 30 हजार किसानों का जत्था 180 किलोमीटर की यात्रा कर नासिक पहुंचा था। जब लोगों का ये हुजूम मुंबई होकर गुजरा तो मुंबई वासियों ने इन किसानों के आंदोलन को सिर आखों पर रखा उनके आंसू पोछें, और उनके जख्मी पैरों पर मरहम भी लगाया। इसकी असल वजह ये थी कि, वो किसान आगजनी नहीं कर रहे थें, बड़े ही शालिनता से सरकार तक अपनी बात पहुंचा रहे थें। आखिरकार उनका आंदोलन सफल हुआ और सरकार और किसानों के बीच समझौता हुआ। अगर ये किसान उग्र होतें तो शायद मुंबई की तस्वीर ही बदल जाती है लेकिन उन्होनें ऐसा कुछ नहीं किया।

फेल होती राज्य सरकारें —

ये जो तस्वीरें देश के अलग अलग हिस्सों से सामने आ रही हैं, इसकी जिम्मेदार बेशक ये बेकाबू भीड़ है लेकिन इसके पिछे एक निकम्मापन राज्य सरकारों का भी है। भारत बंद का ऐलान पहले से ही किया जा चुका था। इंटरपोल से जानकारियां भी मिली थीं कि, ये आंदोलन हिंसक रुप ले सकता है। लेकिन बावजूद इसके राज्य सरकारों के कान पर जू नहीं रेंगी। न तो उन्होनें ऐसी कोई तैयारी कर रखी थी और न ही हिंसा के बाद निपटने के लिए उनके पास कोई उपाय नजर आ रहा था।

कहीं बसों को आग लगाया जा रहा था, कहीं ट्रेन की पटरियां उखाड़ी जा रही थीं। कही खुलेआम पुलिस को पीटा जा रहा था तो कहीं आंदोलन में ताबड़तोड़ फायरिंग की जा रही थी। लेकिन इन सब बातों के बीच प्रशासन किसी लाचार बच्चे जैसा दिख रहा था।

बेशक हमारा इरादा इस आंदोलन के खिलाफ होना नहीं है। आप निसंदेह सरकार और न्यायालय के फैसले के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं लेकिन किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए उसका अनुशासित होना बेहद जरूरी होता है। कानून न तो बनाये डंडे के जोर पर जाते हैं और न ही उन्हें डंडे के जोर पर बदला जा सकता है। हिंसा, प्रदर्शन कर आप महज स्वयं की सरकार की संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं न्यायालय के उस पन्ने पर आपकी जोर आजमाईश का कुछ असर नहीं पड़ने वाला जिसमें बदली गयी कुछ पंक्तियों ने आपके रगों में विद्रोह की आंधी दौड़ा दी है। यकीन मानिए हिंसा किसी भी समस्या का हल नहीं, ये महज एक और समस्या को जन्म देने जैसा है।