आखिर कब तक बाबाओं के घिनौने जाल में फसेंगे हम ?

  By : Team Khabare | September 23, 2017
ram rahim

अश्विनी ‘सत्यदेव’

रहीम, कबीर, बल्ल्भाचार्य और चैतन्य महाप्रभू जैसे संतों की धरती,,,, तुलसी, वेदव्यास और रामकृष्ण परमहंस की जननी भारत की धरा अब संतों से खाली हो चुकी है। विश्वभर में देवभूमि के नाम से जानी जाने वाली भारत भूमि अब अपने ही संतों के कुकर्मों से अपनी अस्मत लुटते हुए रोजाना देख रही है। धर्म, आस्था, भक्ति में सुध बुध खोने वालों की जगह अब हवस, दौलत, लालच और फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में रमने वाले ठग बाबाओं ने ले ली है।

ज्ञान उवाच की जगह फिल्मी धुनों पर थिरकना, परेशानियों को समोसे की चटनी से हल करना, शिष्यों की पीड़ा को देह भोग कर दूर करना, राम की तस्वीर सामने रख कर रावण को भीतर जिंदा रखना बस यही आज के आधुनिक बाबाओं और संतों की दुनिया बन गई है। हालात ये हो गयें हैं कि अब भगवा, रूद्राक्ष, भव्य आभा मंडल, और तिलक धारियों को देख कर ही डर लगने लगा है।

जिन्हें देखकर पहले ज्ञान, संतोष और सुरक्षा, शरण का अनुभव होता था उन्ही लिबाजों में लिपटे हुए बाबाओं को देखकर मन में अज्ञानता, रोष, असुरक्षा और बेघर होने का अनुभव होता है। सोचने वाली बात ये है कि बाबा, संत और ऋषि मुनियों की धरती पर अब व्यभिचार ने घर कर लिया है।

खैर दुराचारी तो कृष्ण और राम काल में भी थें, शिव ने भी व्यभिचारियों का नाश किया था। महाभारत में पूरे परिवार ने मिलकर एक नारी की अस्मत को लुटा था, और रक्त रंजित हो गया था पुरा कुरूक्षेत्र। धर्म, अधिकार और पदों के पाश में बंधे भिष्म, द्रोण और विदुर ने अपने आंखों के सामने द्रौपती की अस्मत को तार तार होते देखा था जिसका फल भी उन्हें भोगना पड़ा।

लेकिन उस समय जो बात नहीं थी वो थी व्यभिचारियों के अनुयायी, और आज हर संत के भीतर रावण जिंदा है। क्योंकि वो रावण उनके संत बनने के बाद उन पर हावी नहीं होता, बल्कि वो दुराचारी पहले से थें और खुद को छिपाने के लिए संतई का चोगा पहने बाद में पहनते हैं। ये तो ऐसे संतों को आईना दिखाना ही मात्र है जिसका दूसरा सिरा हमारी तरफ है फर्क बस इतना है कि वो पिछे से पुता है या नहीं वरना कहीं न कहीं एक दुराचारी हमारे भीतर भी है।

हम बात कर रहे थें अनुयायियों की। इस समय बाबाओं की नियत से बड़ी समस्या उनके अंध भक्त बन चुके हैं। आखिर क्यों देश का एक बड़ा हुजूम ऐसे बाबाओं के लिए जिन्होंने धर्म की आड़ में बालात्कार किया हो उनका पक्षधर बना फिर रहा है। देश विदेश हर जगह करोड़ों भक्तों की फौज कैसे तैयारी हो जा रही है।

वो भक्त जिन्होनें शायद अपने असल पिता जिनका खून उनके रगों में दौड़ रहा है उन्हें प्रेम पूर्वक पिता कहकर संबोधित न किया हो लेकिन राम रहीम और असाराम, रामपाल, नित्यानंद और फलाहारी बाबा जैसे को अपना पिता कहने में संकोच भी नहीं करते है। वो भक्त न केवल समाज में एक ऐसे राक्षस को खून पिला रहे हैं जो उनकी ही बहन बेटियों की भी इज्जत से खेल रहा है बल्कि ऐसे व्यभिचारी को पिता पद देकर अपनी मां को गाली दे रहे हैं।

यदि संतों के गुणों की बात करें तो ,,, वो हमारे पूरखे हमें अर्से पहले समझा चुके हैं जिन्हें पढ़कर शायद हम सभी स्कूलों में अच्छे नबर तो बटोर चुके हैं लेकिन उसे असल जिंदगी में जेहन में नहीं उतार पायें। उसी समय के दो लाइनों पर गौर करियेगा,,, हो सके आपको कुछ स्मरण हो।

तन मन ताको दीजिए, जाके विषया नाहिं।
आपा सबहीं डारिकै, राखै साहेब माहिं।।

ये दोहा कबीर दास ने लिखा था और इसके अनुसार, अपना तन-मन उसी गुरु को सौंपना चाहिए जिसमें विषय-वासनाओं के प्रति आकर्षण न हो और जो शिष्य के अहंकार को दूर करके ईश्वर के मार्ग पर चलने की सलाह दे। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम इस समय क्या कर रहे है।

अरे परेशानियां किसकी जिंदगी में नहीं आती हैं,,, जीवन का पार्यायवाची ही संर्घष है,,,, ठिक उसी प्रकार जैसे पंडित का पार्याय दरिद्र होता है। लेकिन इसका मक्ता ये नहीं कि आप परेशानियों को दूर करने के चक्कर में किसी बाबा के भोग की वस्तु बन जायें।

संत कोई भेष भूषा या फिर कोई एक नाम नहीं है जिस देख कर आप तत्काल पहचान लें,,, हम गुरू को नहीं बल्कि गुरू हमें चुनता है और ये अधिकार अनादिकाल से गुरूओं के पास ही सुरक्षित है। इसे ना ईश्वर बदल पाया और ना ही धरती पर किसी राजा या योद्धा ने। ​हस्तिनापुर के राजकुमारों को द्रोण ने, दशरथ पुत्रों को विश्वामित्र ने, भीम को हनुमान ने, दुर्योधन को बलराम ने, अभिमन्यु को कृष्ण ने चुना था। वहीं अंगराज कर्ण ने स्वत: अपने गुरू परशुराम को और एकलव्य ने स्वयं ही द्रोण को अपना गुरू चुनने की गलती कर दी थी। जिसका परिणाम सर्वविदीत है किसी को रण क्षेत्र में अपनी सारी विधायें विस्मरण हो गई तो किसी को अपने अंगुठे से हाथ धोना पड़ा था।

संत, महंत, गुरू और आधुनिक बाबाओं में कोई तुलना ही नहीं है। असल गुरू आपकी जननी है, वो शिक्षक है जिसने आपको स्लेट पर खड़िया या फिर कागज पर पेंसिल से मां लिखना सिखाया। वो बाबा आपके गुरू नहीं हो सकते हैं जिन्हें मोक्ष की सिढ़ी की बजाय पॉर्न की सीडी में ज्यादा दिलचस्पी है।

विचारणीय: ऐसे फर्जी बाबाओं से दूर रहें और दूसरों को भी उनका अनुसरण करने से मना करें। याद रखें सजग होना ही सुरक्षित होने का प्रथम चरण है। हमारा ये लेख का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। हमें बस आपको उस सच्चाई से रूबरू करा रहे हैं जो हमारे आपके घर के पूजा घरों में रामायण और गीता के रूप में पड़ी धूल फांक रही है, गुरू चुनने से पहले उसे जरूर पढें।