‘भारत बंद’ आंदोलन या फिर राजनीतिक साजिश

By Rahul Tripathi Apr 4, 2018 1:16 pm
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राहुल त्रिपाठी

एससी/एसटी एक्ट पर दलित संगठनों द्वारा ‘भारत बंद’ आन्दोलन के नाम पर जिस प्रकार की अराजकता सड़कों पर देखने को मिली। उसको देखते हुए तो इसे आन्दोलन कहना एक विचारणीय प्रश्न है। भारत बन्द के इस तथाकथित आन्दोलन में अबतक दसियों व्यक्तियों को जान से हाथ धोना पड़ा। साथ ही इस आन्दोलन का हिंसात्मक चरित्र उन प्रदेशों में ज्यादा देखने को मिला जहां बीजेपी की सरकार है। अत: इस आन्दोलन को राजनीति प्रेरित हिंसात्मक प्रदर्शन कहा जा सकता हैं, जिसका शिकार आम आदमी हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर जिस प्रकार दलित आन्दोलन के नाम पर हिंसा को प्रशय दिया जा रहा है। और किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा इस हिंसा का विरोध न करना, अपने आप में एक गम्भीर सवाल बनकर हमारे सामने खड़ा है। क्या वोट बैंक की राजनीति में मानवीय संवेदनाओं का कोई स्थान नहीं है? जिस प्रकार से मृतकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, उसको देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि लाशों की ढेर पर बैठ कर राजनीति चमकाई जा रही है।

गौर करने लायक बात यह है कि यह आन्दोलन लगभग दस राज्यों में देखने को मिला लेकिन हिंसा का सर्वाधिक तांडव तीन राज्यों में देखा गया- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान। क्या यह महज संयोग है कि इन तीनों राज्य में बीजेपी की सरकार है? वहीं दूसरी तरफ ऐसे राज्य जहां अन्य पार्टियों की सरकार है। वहां आन्दोलन का हिन्सात्मक चरित्र देखने को नहीं मिला जैसे पंजाब। उल्लेखनीय बात यह है कि पंजाब देश का सर्वाधिक दलित प्रतिशत वाला राज्य है। फिर भी यहां पर प्रदर्शन तक की घटनाएं बहुत कम सामने आई। तो क्या यह मान लिया जाए कि यहां के दलितों को कोर्ट की एडवाइजरी से दिक्कत नहीं है। इससे तो यह भी निष्कर्ष सामने आता है कि अन्य पार्टियों द्वारा शासित राज्य सरकारों में दलित असमानता तथा शोषण से पूरी तरह मुक्त हैं।

वास्तव में यह सत्य नहीं है। जिस प्रकार से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से, जहां प्रदेश में सर्वाधिक हिंसा हुई, हिंसा भड़काने के आरोप में पूर्व बीएसपी विधायक का पकड़ा जाना तथा मध्य प्रदेश में हथियारों के साथ भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने के आरोप में कांग्रेस के नेता के भाई का नाम आना। ये सब इस बात को प्रमाणित करते हैं कि इस आन्दोलन को हिंसात्मक तत्वों द्वारा हथिया कर, एक निश्चित राजनैतिक उद्देश्य के तहत हिंसा फैलाई गयी है। हिंसात्मक भीड़ के द्वारा गरीबों को भी नहीं बक्सा गया और उन्हें भी लूटा गया। अत: इस आन्दोलन के औचित्य पर ही प्रश्न उठता है।

राजनीति का यह चरित्र जिसमें निर्दोष व्यक्तियों की हत्या को सत्ता प्राप्त का जरिया बनाया जाए, भारतीय संविधान की मान्यताओं के लिए खतरनाक है। इस तरह कि घटनाएं भारत की लोकत्रांतिक मूल्यों के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। जिस प्रकार हिंसात्मक घटनाओं में राजनीतिक पार्टियों के व्यक्तियों की संलिप्तता सामने आ रही है। उससे एक बात तो स्पष्ट है कि यह सामाजिक गैरबराबरी, या अत्याचार को लेकर आन्दोलन नहीं है बल्कि राजनैतिक उद्देश्य के लिए सत्ता प्राप्ति का एक माध्य है। जो चंद राजनीतिज्ञों द्वारा किया गया भयानक षड़यंत्र है। जिस प्रकार लोग शस्त्रप्रदर्शन करते हुए गोलियां, आगजनी और पथराव कर रहे हैं, यह आंदोलन नहीं पूर्ण हिंसा है। निर्दोषों को निशाना बनाकर सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। ऐसे में इसको आंदोलन नहीं बल्कि प्रायोजित राजनीति से प्रेरित हिंसात्मक षड़यंत्र है।

उच्चतम न्यायालय ने 20 मार्च को एससी/एसटी एक्ट पर फैसला दिया, जिसमें कोर्ट ने माना की इस एक्ट का दुरूपयोग हो रहा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष महाजन पर दर्ज एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत एफआईआर को गलत पाया। जिसके बाद न्यायालय ने एससी/एसटी एक्ट की नई गाइड लाइन जारी कर दी। नई गाइड लाइन के अनुसार इस एक्ट के तहत मामला यदि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ है, तो उसकी गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथार्टी की इजाजत के बाद ही हो सकती है। जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं हैं उनकी जांच के बाद एसएसपी की इजाजत से ही सम्बंधित व्यक्ति की गिरफ्तारी हो सकती है। इस एक्ट के दुरूपयोग से बेगुनाहों को बचाने के लिए अब शिकायत मिलने पर आपराधिक मामला तुरन्त ही दर्ज नहीं किया जाएगा, बल्कि जांच के बाद ही उस पर मामला चलाया जाएगा। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि हमें इस कानून के गलत इस्तेमाल की चिंता है।

तथाकथित आंदोलनकारियों और राजनीतिक पार्टियों का ऐसा मानना है कि एससी/एसटी एक्ट में सुधार के बाद उनपर अत्याचार काफी बढ़ जाएगा। ये अलग बात है कि इस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों में एक बड़ी संख्या बेगुनाहो की होती है और कई ऐसे उदाहरण है जब इस एक्ट में दर्ज मुकदमें फर्जी पाये गये। अत: सुप्रीम कोर्ट की एडवाइजरी का उद्देश्य बेगुनाहों को बचाना है न की एक्ट को कमजोर करना। इसका विरोध करने वालों को कोर्ट के आदेश को ध्यान से पढ़ना चाहिए। क्योंकि विरोध करने वाले बहुतों को इसकी सही जानकारी नहीं है। वह केवल अफवाहों के आधार पर ही विरोध कर रहे हैं।

वास्तव में समाज के निम्न तबकों पर होने वाले अत्याचार और भेदभाव, जब 1955 में आये Protection of civil rights act के द्वारा खत्म नहीं किया जा सका, तो सरकार ने 1989 में एससी/एसटी अधिनियम को लागू किया गया। इसे जम्मू कश्मीर को छोड़ कर सम्पूर्ण भारत में लागू किया गया। जिसके जरिए भारतीय समाज को भेदभाव से रहित तथा अत्याचार मुक्त एक मजबूत देश की परिकल्पना की गयी थी। उस समय यह नहीं सोचा गया था कि इसका दुरूपयोग भी होगा। लेकिन इस एक्ट के द्वारा बढ़ते फर्जी मुकदमों ने इसके पवित्र उद्देश्य पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये हैं। आज यह खुद अत्याचार तथा भेदभाव का हथियार बन गया है। इस एक्ट के जरिए शोषण का अधिकार एक दूसरे वर्ग को दे दिया गया है।

यह निहायत ही दु:खद बात है कि राजनीतिक पार्टियां तुष्टीतरण की राजनीति के कारण आन्दोलन के नाम पर इस हिंसा को प्रशय दे रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने एक्ट की कमियों को दूर करने का प्रयास किया, लेकिन वोट बैंक के स्वार्थ में अकण्ठ डूबी सभी पार्टियां, न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुचाने में जरा सा भी हिचक नहीं दिखाया। यह इस बात का गवाह है कि हमारी राजनैतिक व्यवस्था कितनी खोखली हो चुकी है। इस कानून को इसलिए बनाया गया था कि इससे सामाजिक न्याय की रक्षा होगी और समाज में व्याप्त अत्याचार मूलक बुराई को जड़ से दूर कर दिया जायेगा, न कि इसलिए की यह खुद ही सामाजिक अत्याचार का एक माध्यम बन जाए।

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