पढ़िए कांवड़ यात्रा की शुरूआत, मुहूर्त, महत्व और नियम

By Bankatesh Kumar Aug 3, 2018 6:10 pm

नई दिल्ली। उत्तर भारत समेत समूचे देश में श्रावण माह पर हर्षोल्लास के साथ कांवड़ यात्राएं निकाली जा रही हैं। यात्रा में लाखों शिवभक्त कांवड़ को कंधे पर रखकर केसरिया रंग के कपड़े धारण कर ऋषिकेश, हरिद्वार जैसी पवित्र जगह से गंगा जल लेकर आ रहे हैं। इसी जल को शिवलिंग पर चढ़ाने की प्रथा है। कांवड़ यात्रा की शुरूआत 28 जुलाई से हो चुकी है, जोकि पूरे 1 महीने तक चलेगी

कांवड़ परंपरा की शुरूआत

पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम शिव जी के उपासक थे। उन्‍होंने शिव पूजा के लिए भोलेनाथ का मंदिर बनवाया था। उन्‍होंने कांवड़ में गंगाजल भरा था और उसी जल से शिव जी का जलाअभिषेक किया। इसी दिन से कांवड़ यात्रा की पंरपरा की शुरुआत मानी गई है।

कांवड़ यात्रा का समय

बता दें कि कांवड़ यात्रा पर्व हर वर्ष श्रावण ( सावन ) माह में चतुर्दशी के दिन मनाया जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह यात्रा जुलाई-अगस्त के महीने में की जाती है। इस वर्ष कांवड़ यात्रा 28 जुलाई से शुरू हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ तब उसमें से विष निकला था। इसे शिव ने पिया था और विष के प्रभाव को कम करने के लिए गंगा जी को बुलाया गया। तभी से सावन के महीने में शिव जी को गंगाजल चढ़ाने की पंरपरा बनी। ज्‍यादातर कांवड़िए केसरी रंग के वस्‍त्र धारण करते हैं। भक्त मुख्‍य रूप से गौमुख, इलाहाबाद, हरिद्वार या गंगोत्री जैसे तीर्थस्थलों से गंगाजल भरते हैं।

कांवड़ का महत्व

कांवड़ यात्रा का महत्व खासकर उत्तर भारत में है। क्योंकि सावन के महीने में सभी देवता आराम करने निद्रा में चले जाते हैं। उस समय सभी देवताओं का कार्य भगवान शिव संभालते हैं। इसलिए इस माह को भोलेनाथ का प्रिय मानते हैं। कांवड़ यात्रा पर प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार से लाखों भक्त जाते हैं। भक्त अलग-अलग तरीके से अपनी कांवड़ सजाते हैं और पवित्र स्थान से जल भरकर उसमें रखकर लाते हैं। उस जल में भांग, बेलपत्र, धतूरे, फल, दूध, चीनी आदि मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। ऐसा मानते हैं कि ऐसा करने से उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कुछ भक्त तो हिमालय के गोमुख का पवित्र जल लेकर दक्षिण भारत में तमिलनाडु राज्य में स्थित रामेश्वरम मंदिर तक जाते हैं। इसमें उन्हें 6 माह तक का समय लग जाता है। कांवड़ यात्रा के रास्तें में स्थानिय लोग भक्तों के खाने पीने से लेकर सेहत का भी ख्याल रखते हैं।

कांवड़ यात्रा के नियम

कांवड़ लाते समय शराब आदि का सेवन नहीं कर सकते। 

कांवड़ में जल भरने के बाद जब तक उस जल को शिवलिंग पर नहीं चढ़ाते तब तक कांवड़ के नीचे से कोई निकल नहीं सकता है और न उसे जमीन पर रखते हैं।

अगर कहीं रखना है तो कांवड़ को पेड़ या किसी ऊंचे स्‍थानों पर लटका सकते हैं।

जबतक कांवड़ कंधे पर तब तक कुछ खा नहीं सकते। 

चमड़े से बने सामानों या कपड़ों को नहीं पहनना चाहिए।

यात्रा में भोलेनाथ का नाम जपना और हर हर महादेव जैसे नारे लगाने चाहिए। 

यात्रा को पैदल करने का विधान है और अगर कोई मन्‍नत मांगी है और उसे पूरी होने पर यात्रा कर रहे हैं तो मन्‍नत के अनुसार यात्रा होनी चाहिए।

इन मंदिरों में चढ़ता है सबसे ज्यादा जल

बैजनाथ धाम, झारखण्ड

बटेश्वर मंदिर, आगरा

महाकाल मंदिर, उज्जयनी

गंगोत्री, उत्तराखण्ड

यमुनोत्री, उत्तराखण्ड

बद्रीनाथ, उत्तराखण्ड

रामेश्वरम,  तमिलनाडु

पुरा महादेव मंदिर,  उत्तर प्रदेश

खेरेश्वर मंदिर, अलीगढ़

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