इस गांव में नहीं होती है हनुमान की पूजा, जानिए वजह

By Team Khabare Jan 3, 2018 2:02 pm

अश्विनी ‘सत्यदेव’

। लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
॥ श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥

हनुमान जी, एक ऐसे देवता जिनका सुमिरन हर व्यक्ति विपदा में करता है। बचपन से हमें यही शिक्षा मिली है कि जब कभी आप किसी परेशानी और विपत्ती में फंसे हो तो प्रभू श्रीराम भक्त हनुमान का स्मरण करें निश्चय ही आपको विपत्तियों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होगी और आप समस्याओं से पार पायेंगे। लेकिन देश में एक ऐसा गांव भी है जहां राम भक्त हनुमान की पूजा नहीं जाती है। यहां तक हनुमान जी के एक कार्य के चलते ये गांव पिछले 1,296,000 सौर वर्ष से हनुमान जी से नाराज है। तो आइये आपको बताते हैं कि आखिर इस गांव में प्रभू हनुमान की पूजा अर्चना आखिर क्यों वर्जित है।

आखिर कौन सा है वो गांव:

इस समय आपके जेहन में सबसे बड़ा सवाल यही कौंध रहा होगा कि, आखिर वो गांव कौन सा जहां हनुमान की पूजा वर्जित है। तो बताते हैं, उस गांव का नाम है द्रोणागिरी, ये गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर स्थित है। प्राचिन काल से ही इस गांव की मान्यता है कि यहां के निवासी हनुमान जी से नाराज है।

आखिर क्यों हैं नाराज:

दरअसल लंका कांड के दौरान जब लक्ष्मण और मेघनाथ के बीच युद्घ होता है तो मेघनाथ लक्ष्मण पर ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करता है। जिसके बाद लक्ष्मण मूर्क्षित हो जाते हैं, इस दौरान मेघनाथ लक्ष्मण जी को उठाने का प्रयास करता है लेकिन वो उठा नहीं पाता है। तब हनुमान जी लक्ष्मण जी को लेकर प्रभू श्रीराम के पास लेकर आते हैं।

सुषेण वैद्य का आगमन:

जब लक्ष्मण जी को मूर्क्षित अवस्था में हनुमान लेकर पहुंचते हैं तो राम की सेना में शोक की लहर दौड़ जाती है। इसी बीच विभीषण श्री राम से कहते हैं कि, “लंका में एक वैद्य है, जिसका नाम सुषेण है, लेकिन वे लक्ष्मण के उपचार के लिए आएंगे कि नहीं, यह कहना मुश्किल है। तब हनुमान जी कहते हैं कि मैं सुषेण को ही उठा लाउंगा और इतना कह कर वो लंका की तरफ प्रस्थान कर जाते हैं। जब हनुमान लंका पहुंचते हैं तो उस भवन को ही उठा लाते हैं जिसमें सुषेण वैद्य सो रहे थें। सुषेण लक्ष्मण की हालत देखते हैं और संजीवनी बूटी लाने को कहते हैं।

हनुमान का संजीवनी बूटी लाना:

सुषेण के बताये अनुसार हनुमान जी प्रस्थान करते हैं और पहुंच जाते हैं द्रो​णागिरी पर्वत पर। चूकिं हनुमान संजीवनी बूटी को पहचान नहीं सकते हैं तो वो वहां पर एक वृद्ध महिला से बूटी के बारे में पुछते हैं। वो महिला उन्हें द्रोणागिरी पर्वत के उस हिस्से को दिखाती है जहां संजीवनी बूटी थी। हनुमान जी बूटी को पहचान नहीं पाते है लिहाजा वो पर्वत के उस हिस्से को ही उखाड़ कर अपने साथ ले जाते हैं।

नाराजगी का कारण:

ऐसी मान्यता है कि, हनुमान जी की इसी कार्य के वजह से उस वक्त से इस गांव के लोग हनुमान जी से नाराज है। उसी वक्त से हनुमान जी की पूर्जा अर्चना को इस गांव में वर्जित कर दिया गया। बताया जाता है कि, उस दौर में गांव के लोगों ने उस महिला को जिसने हनुमान जी को संजीवनी बूटी और पर्वत के बारे में बताया था उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया।

आज भी जाहिर करते हैं नाराजगी:

संजीवनी बूटी मिलने के बाद सुषेण ने तत्काल लक्ष्मण जी का उपचार किया और उन्हें एक बार फिर से ठीक कर दिया। लेकिन आज भी गांव वाले आराध्य देव पर्वत की विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलायें इस पूजा में खुलकर हिस्सा लेती हैं।

आज भी लंका में संजीवनी का पर्वत:

हमारे देश में दो रामयणों का चलन है, एक है तुलसीदास रचित रामायण और दूसरा है वाल्मिकी रामायण। हालां​कि दोनों के कथानक में खासा अंतर भी मिलता है। जहां वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार हनुमान जी पर्वत को पुनः यथास्थान रख आए थे वही तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार हनुमान जी पर्वत को वापस नहीं रख कर आए थे, उन्होंने उस पर्वत को वही लंका में ही छोड़ दिया था।

श्रीलंका में श्रीपद पर्वत:

इस पूरे घटनाक्रम में भेद हो सकता है लेकिन ऐसी भी मान्यता है कि, श्रीलंका के सुदूर इलाके में श्रीपद नाम का एक पहाड़ है। लोगों का मानना है कि ये वही पर्वत है जिसे हनुमान जी उत्तराखंड से लेकर आये थें और इस पर्वत को अब एडम्स पीक के नाम से जाना जाता है। आपको बता दें कि, ये पर्वत लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

रिलेटेड पोस्ट